Saturday, 1 July 2017

बरसाती आवारा !

अगिन विरह की पवन जो बोता,
दुबकी दुपहरी सूख गया सोता।

जले खेत हो मिट्टी राखी,
मुरझाये हो मन के पाखी।


तड़पे वनस् पति और पक्षी,
प्रेम पाती को तरसी यक्षी।

दिवस उजास और रातें काली,
आकुल व्याकुल वसुधा व्याली। 


प्यासी नदियाँ, सूखे कुएँ
चील चिचियाती, उठते धुएँ
धनके सनके, सूरज पागल,
अब भी भला, न बरसे बादल!


सूरज तपता धरती जलती
कण कण माटी का रोया।
बादल मैं! आंसू से मैंने
धरती का आँचल धोया।


रिस रिस कर मैं रसा रसातल
रेश रेश रस भर जाता हूँ।
यौवन जल छलकाकर के
सरित सुहागन कर जाता हूँ।


उच्छ्वास मैं घनश्याम का,
चेतन की धारा अविरल ।
प्राण पीयूष पा आप्लावन,
चित पुलकित प्रकृति पल पल।


प्राणतत्व मै, मनस तत्व मै
जीव संजीवन धारा हूँ,
विकल वात वारिद बादल बस !

बरसाती आवारा हूँ !