Wednesday, 10 May 2017

हँसा के पिया अब रुला न देना.

तथागत यशोधरा के द्वार पधारते हैं और उन्हें बोधिसत्व की ज्ञान आभा से ज्योतित कर अपनी करुणा से सराबोर करते हैं:-
   प्रीता प्राणों के पण में,
       राजे चंदा का संजीवन/
       बोधिसत्व पावन सुरभि, 
       महके तेरा तन-मन हर क्षण/

       तू चहके प्रति पल चिरंतन,
        भर बाँहे जीवन आलिंगन/
        मै मूक पथिक नम नयनो से. 
       कर लूँगा महाभिनिष्क्रमण !

यशोधरा अपने सन्यासी पिया के चिन्मय ज्ञान का पान कर फूले नहीं समाती. भवसागर से मुक्ति की यात्रा में उनकी सहगामिनी बनने को तत्पर होती है और मन ही मन अपनी भावनाओं से तरल हो रही है:-
    यह कैसा चिर स्पंदन!
    देखो, जागे ये निर्मल मन.

    उर पवित्र मंद मचले कम्पन,
    उतरे परिव्राजक मन दर्पण.

    बोधिसत्व कपिलायिनी भद्रा बन,
    तरल अंतस पसरे छन छन.

    उपवासी अन्तेवासी हूँ,
    प्रेम पींग की झुला न देना .

    मैं जागी अब सुला न देना ,
    हँसा के पिया अब रुला न देना.