Thursday, 30 March 2017

चैता की तान

पवन शरारत उधम करता/
अमराई की छाहों में//
धरती सरमाती सुस्ताती/
चुलबुल चैत की बाहों में//

शीत तमस ने किया पलायन/
सूरज ने ऊष्मा घोली//
कोकिल कुंजित चित चितवन में/
हारिल की हरी डाली डोली//

रेतों की चादर को ओढ़े/
अलसाई मुरझाई दरिया//
सरसों के पीले फूलों को/
सूंघती उंघती धुप दुपहरिया//

दिन तिल तिल कर पांव पसारे/
शरमाई सकुचाई रातें//
नयी नवेली दुल्हनिया की/
रही अधूरी प्यार की बातें// 

गिलहरियों की कानाफुसी/
मंजरी महके बाग़ बगान//
पंचम में आलाप गुंजरित/
स्वर लहरी चैता की तान// 

Sunday, 26 March 2017

महादेवी वर्मा : जन्मदिवस स्मृति

चन्द्रमा मन की भावनाओं का प्रतिनिधि देवता माना गया है. पूर्णिमा तिथि को राकेश अंतरिक्ष में अपनी सम्पूर्ण कलाओं में विराजमान होते हैं. मान्यता है इस तिथि को जन्मे जीव में वह अपने भाव सौष्ठव की अद्भुत भंगिमा घोल देते हैं. २५ मार्च १९०७, फाल्गुन पूर्णिमा, को अद्भुत भाव गंगोत्री को अपने में समाहित किये एक विलक्षण कली ने वसुधा के अंक को सुशोभित किया . इस बिटिया का जन्म उस कुल  के लिए एक अद्भुत वरदान था क्योंकि इससे पिछले २०० वर्षों में इस परिवार ने किसी बेटी की मुस्कराहट का सौभाग्य नहीं भोगा था. जाहिर है पुत्री के लालन पालन और लाड़ प्यार में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी.पितामह फारसी और उर्दू ही जानते थे . उन्होंने अपने पुत्र को अंग्रेजी पढ़ाई . अंग्रेजी एम ए में विश्वविद्यालय में उन्होंने प्रथम स्थान पाया. उन्हें हिंदी नहीं आती थी. नन्ही बिटिया की पढ़ाई लिखाई का पूरा ख्याल रखा इस फर्रुखाबादी परिवार ने. प्रारम्भिक शिक्षा दीक्षा इंदौर में हुई. संस्कृत, चित्रकला, संगीत आदि की शिक्षा दी गयी. ९ वर्ष की अल्प आयु में हाथ पीले कर दिए गए. अल्प व्यवधान के अंतराल के पश्चात् पुनः १९१९ में इलाहबाद से फिर पढाई ने पटरी पकड़ी . १९३२ में प्रयाग विश्वविद्यालय ने संस्कृत में स्नाकोत्तर की उपाधि प्रदान की. माँ वीणापाणी की यह श्वेत पद्म-कली भारतीय वांगमय की वाक्देवी रूप में महादेवी वर्मा के नाम से प्रतिष्ठित हुई.
धुर सनातनी परिवेश में पनपी महादेवी के बाल स्वर में रुढिवादिता के प्रति विद्रोह के ज्वार फूटे.अपने जीवन के सप्तम वसंत में उनको परिवार के पंडितजी ने राधा द्वारा कृष्ण से बांसुरी मांगने के प्रसंग को समझाकर " बोलिहै नाहीं " समस्या की पूर्ति करने को कहा. महादेवी ने व्यंग्य उद्घोष कर दिया :-
    "मंदिर के पट खोलत का ,
    ये देवता तो दृग खोलिहै नाहीं.
    अक्षत फूल चढाऊं भले ,
    हर्षाये कबौं अनुकुलिहैं नाहीं.
    बेर हज़ार शंखहि फूंक ,
    पै जागिहैं ना अरु डोलिहैं नाहीं .
    प्रानन में नित बोलत हैं
    पुनि मंदिर में ये बोलिहैं नाही.
प्रत्यक्षतः ठाकुरजी के विरोधी स्वर पर माँ और पंडितजी की अप्रसन्नता झेलने के प्रसंग पर महादेवी ने खुद स्वीकारा है "संभवतः मेरे अवचेतन मन में मेरे दर्शन या विचार की दिशा बन रही होगी ".


Wednesday, 22 March 2017

यादों के गलियारे

अभी सड़क मार्ग से कटिहार और पूर्णिया की दो दिवसीय लम्बी यात्रा पर   निकला हूँ .गतिशीलता में लिखने का जोखिम उठाने का एक अलग आनंद है. मुझे सड़क मार्ग से यात्रा बहुत पसंद है. बिहार और झारखण्ड , ये दो राज्य मेरे प्रभार में हैं.इनका चप्पा चप्पा मैं घूम लेता हूँ.प्राचीन भारत का इतिहास इन्ही क्षेत्रों का इतिहास है. पश्चिम में हड़प्पा और मोहेंजोदड़ो के अवशेष को छोड़कर इतिहास की प्राचीनता का लगभग सर्वांग इन्ही क्षेत्रों में बिखरा है.पाटलिपुत्र करीब १००० वर्षों तक लगातार सर्वोच्च राजनितिक सत्ता और संप्रभुता का अक्षुण्ण केंद्र बना रहा. वैशाली लोकतांत्रिक गणराज्य की अवधारणा का उत्स है.
अभी लिखते लिखते मेरी नजरे खिड़की के बाहर के नजारे पर चली गयी. मोकामा पुल पर गाडी ने धावा बोल दिया है . गंगा की छाती को नापता विशाल रेल सह सड़क पुल -दो मंजिला. मै जय जय काली के जय घोष के साथ धुंआ उगलती रेल गाडी पर सवार होकर भी इस पुल को पार कर चुका हूँ.अब तो बिजली के पों पों वाले रेल इंजिन आ गए हैं. इस पुल का डिजाइन मेरे संस्थान आई आई टी रूड़की के स्नातक इंजिनियर और प्रोफेसर घनानंद पांडे ने किया था.उन्हें पद्म बिभूषण से अलंकृत किया गया था. यह तब का ज़माना था जब इस देश में शुचिता थी और क्लर्क छाप नौकरशाहों की राजनितिक चमचागिरी परवान नहीं चढ़ी थी. मेरे शाही नौकर मित्र इस कटु सत्य पर बिफरकर अपना समय जाया न करे.
     हाँ, सामने साफ़ साफ़ दिख रहा है पतित पाविनी माँ भागीरथी की ममता की अपार जल राशि का अपरिमेय विस्तार. सूरज की किरणों में चमचमाता विशाल स्वर्णिम तरल थाल! दूसरे छोर पर आलसी की मानिंद लेटा सिमरिया घाट. और हमारी माँ की अंत्येष्टि भूमि. कर्क रोग(ब्लड कैंसर) के आगोश में काल की वक्र कुटिल नज़रो से घिरी माँ को टाटा मेमोरियल अस्पताल मुंबई  के कर्तव्यनिष्ठ चिकित्सको की लाख कोशिशें नहीं बचा सकी.१९९२ में मेरी माँ ने सिमरिया के इसी घाट पर अपनी ममता मञ्जूषा के साथ मेरा संरक्षण भगवान शिव की जटा वासिनी  गंगा को सौंप दिया था और अपने गंगा जल भरे लोचन से माँ को मुखाग्नि देकर मैंने उसे अंतिम अग्नि स्नान कराया था. तरल आँखों से निःसृत अश्रु वेग रोम रोम को प्रकम्पित कर रहा था. जीवन का रहस्य आहिस्ता आहिस्ता मन में रास्ता बना रहा था. तुलसी का 'क्षिति ,जल, पावक ,गगन, समीरा ' समझ में आने लगा था. यह मेरे जीवन का सबसे अद्वितीय महत्वपूर्ण काल था जहां से जीवन दर्शन और आध्यात्मिक सूझ का ' मेटा मौर्फोसिस ' होना शुरू हो गया है और यह प्रक्रिया शायद मेरे अग्नि स्नान के उपरांत भी घटित होता रहे- यह भविष्य के गर्भ में है. मेरी ' माँ ' कविता उसका स्मृति आख्यान है.तब मेरी शादी हुए चार साल ही हुए थे.........दृगजल थोड़े विराम की याचना कर रहे हैं........
          ...................
          ..... हाँ , अब सिमरिया गाँव के करीब से गुजर रहे हैं. भारतीय साहित्य का पालना. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्म भूमि. वह पवित्र वसुधा जिसकी हर रेणु देशभक्ति की सिंदूर से सजी धजी सुहागन है. जहां का हर किशोर ताल ठोकता है "पर फिरा हमें गांडीव गदा , लौटा दे अर्जुन भीम वीर." दूर से ही उनकी आदमकद प्रतिमा और दिनकर द्वार को प्रणाम करता हूँ. सीढ़ी चढ़ते वक़्त लड़खड़ाते नेहरु को अपनी बलिष्ठ भुजाओं में थामकर दिनकर ने कहा था " जब राजनीति लड़खड़ाती  है तो साहित्य उसे थाम लेता है." ये तब की बात है जब साहित्य में मूल्यों का मूल्य था और 'दाम-वाम' के नाम पर साहित्य में पुरस्कार खरीदे और लौटाए नहीं जाते थे. 



          ..........गाडी तेलशोधक कारखाना ,बरौनी अब छोड़ रही है. यहाँ एक विद्युत् ताप घर भी है. स्वतंत्रता के उपरांत सोवियत संघ के सहयोग से आधुनिक भारत के ये मंदिर बने थे. यहाँ पूर्वोतर रेलवे का डिवीज़न और बहुत बड़ा जंक्शन है. बेगुसराय जिला के क्षेत्र उपजाऊ और भूमिपतियों के क्षेत्र हैं. आश्चर्य है कि यह मार्क्सवाद की भी बड़ी उर्वर भूमि है. कौमुनिस्टों के इस गढ़ को भारत का लेनिनग्राद भी कहते हैं. जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में "भारत तेरे तुकडे होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह " के नारे के आरोपित उद्घोषक छात्र संघ अध्यक्ष ' कन्हैया ' भी इसी क्षेत्र के हैं. चुनाव में  ' बूथ कैप्चरिंग ' की विचारधारा ने यही मूर्त अभिव्यक्ति पायी थी. मेरे पिताजी यहाँ के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी और अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश थे.तब मै नया नया नौकरी में आया था और यदा कदा यहाँ आया करता था. तब बिहार मंडल आन्दोलन की आग में जल रहा था और मेरी अगडी जाति , भूमिहार, (बेगुसराय जिला भूमिहार भूपतियों के वर्चस्व वाला जिला है.) से होने के कारण यह क्षेत्र सुरक्षित था.
          हां, तो मैं बिहार की गौरव गाथा गा रहा था.संभवतः रोम के सिवा दुनिया में कोई दूसरा पाटलिपुत्र नहीं जो करीब १००० वर्षों तक लगातार ऐसे विशाल शक्तिशाली भारत की सत्ता और संप्रभुता का केंद्र रहा हो, जिसके बारे में प्रसिद्द इतिहासकार ' बाशम ' का कहना है कि इतना विशाल, वैभवशाली एवं शक्तिशाली भारत भविष्य के लिए कल्पना मात्र है. कला. साहित्य, विज्ञान , गणित, दर्शन, अध्यात्म  सभी  विधाओं का सिरमौर. ध्रुव, माँ सीता , लव् ,कुश, राजा जनक, गौतम ऋषि,अहल्या, ऋतंभरा, रम्भा, कालिदास, हिन्दू षडदर्शन ,विद्यापति, समुद्रगुप्त,  बिम्बिसार, अजातशत्रु , अशोक, चन्द्रगुप्त मौर्य , धन्वन्तरी, सुश्रुत, चरक, चाणक्य, कौटिल्य, वात्स्यायन , विष्णुगुप्त, भास्कर, आर्यभट, कालिदास , बुद्ध ,महावीर  और न जाने कितने अनगिनत भारत माँ के विलक्षण लाल रत्नों की जन्म भूमि और कर्मभूमि! नालंदा विश्वविद्यालय , विक्रमशिला विश्व विद्यालय जैसे शिक्षा के गौरव संस्थान इसी धरती पर खड़े हुए थे. फाह्यान, ह्वेन सांग जैसे विश्व भ्रमणकारियों की विश्रामस्थली बिहार नेपाल की तराई से सटा वैदिक ऋचाओं का वह रचना स्थल है जो  'कवि  जय शंकर प्रसाद' के शब्दों में:
          "हिमालय के आँगन में उसे प्रथम किरणों का दे उपहार
          उषा ने हँस अभिनन्दन किया और पहनाया हीरक हार."
         जननी, जन्मभूमि स्वर्गादपि च गरीयसी. आज शायद इस बिहार यात्रा में ये बाते याद आनी  इसलिए भी लाजिमी है कि आज बिहार दिवस है.
         २२ मार्च १९१२ को बंगाल से काटकर बिहार अलग हुआ था . राजधानी पटना और ग्रीष्म राजधानी पुरी. बाद में १ अप्रैल १९३६ को ओडिशा अलग प्रान्त बना. सबको बिहार दिवस की शुभकामनाएं.
          गाडी धीरे धीरे बेगुसराय छोड़ने को तत्पर है. मेरे नयनो के कोर  नमकीन होकर चुपके से राष्ट्रिय राज मार्ग के किनारे उस घर पर अटक गए जहां हमने अपने समय कभी अपनी माँ के साथ गुजारे थे . मेरी टकटकी निगाहों ने गाडी की गति में तेजी से ओझल होते हुए उस मंदिर को भरे रुंधे मौन स्वर से प्रणाम किया जहां मैंने अपनी माँ को उसके अल्पकालीन पृथ्वी प्रवास का अंतिम छठ व्रत कराया था.
          इससे पहले वह मेरे साथ ही तेजपुर ,असम में रह रही थी. मेरी ज़िन्दगी के आनंद  और उत्कर्ष का वह स्वर्ण काल था. मै एन टी पी सी से त्यागपत्र देकर भारतीय इंजीनियरी सेवा में आया था और असम में तैनाती हुई थी . तेजपुर में रेडियो स्टेशन बनाना था. मै, मेरी पत्नी और छोटी नन्ही बिटिया ने माँ के साथ मिलकर अपनी बड़ी बेटी का दूसरा जन्मदिन साथ साथ मनाया था. फिर पिताजी माँ को वापस ले गए थे. विदा लेती माँ रिक्शे पर पीछे मुड़कर अपलक मुसलाधार बरसाती आँखों से मुझे निहारे जा रही थी और मै हतशून्य , धुंधली आँखों से उसकी आकृति को बिंदु से बिन्दुतर बनाता चला गया. स्मृति पटल पर वे ताज़े बिंदु अभी भी ज्यों के त्यों तैर रहे हैं. लेखनी थम गयी है यादों के उन गलियारों में!........!!!
   

Sunday, 19 March 2017

सपनों के साज

दुःख की कजरी बदरी करती , 
मन अम्बर को काला . 
क्रूर काल ने मन में तेरे , 
गरल पीर का डाला . 
ढलका सजनी, ले प्याला , 
वो तिक्त हलाहल हाला// 

मुख शुद्धि करूं ,तप्त तरल 
गटक गला नहलाऊं , 
पीकर सारा दर्द तुम्हारा , 
नीलकंठ बन जाऊं . 
खोलूं जटा से चंदा को, 
पूनम से रास रचाऊं // 

चटक चाँदनी की चमचम 
चन्दन का लेप लगाऊं , 
हर लूँ हर व्यथा थारी 
मन प्रांतर सहलाऊं . 
आ पथिक, पथ में पग पग 
सपनों के साज सजाऊं //

Thursday, 16 March 2017

तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!

मीत मिले न मन के मानिक
सपने आंसू में बह जाते हैं।
जीवन के विरानेपन में,
महल ख्वाब के ढह जाते हैं।
टीस टीस कर दिल तपता है
भाव बने घाव ,मन में गहरे।

तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!

अंतरिक्ष के सूनेपन में
चाँद अकेले सो जाता है।
विरल वेदना की बदरी में
लुक लुक छिप छिप खो जाता है।
अकुलाता पूनम का सागर
उठती गिरती व्याकुल लहरें।

तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!

प्राची से पश्चिम तक दिन भर
खड़ी खेत में घड़ियाँ गिनकर।
नयन मीत में टाँके रहती,
तपन प्यार का दिनभर सहती।
क्या गुजरी उस सूरजमुखी पर,
अंधियारे जब डालें पहरे।

तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!

वसुधा के आँगन में बिखरी,
मैं रेणु अति सूक्ष्म सरल हूँ।
जीव जगत के अमृत घट में,
श्रद्धा पय मैं भाव तरल हूँ।
बहूँ, तो बरबस विश्व ये बिहँसे
लूँ विराम,फिर सृष्टि ठहरे।

तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!

Thursday, 9 March 2017

जुलमी फागुन! पिया न आयो.

जुलमी फागुन! पिया न आयो.


बाउर बयार, बहक बौराकर
तन मन मोर लपटायो.
शिथिल शबद, भये भाव मवन
सजन नयन घन छायो.


मदन बदन में अगन लगाये
सनन  सनन  सिहरायो
कंचुकी सुखत नहीं सजनी
उर, मकरंद  बरसायो .


बैरन सखियन, फगुआ गाये
बिरहन  मन झुलसायो.
धधक धधक, जर जियरा धनके
अंग रंग सनकायो.


जुलमी फागुन! पिया न आयो.


टीस परेम-पीर, चिर चीर कर
रोम रोम  सहरायो
झनक झनक पायल की खनक
सौतन, सुर ताल सजायो


चाँद गगन मगन यौवन में
पीव  धवल  बरसायो
चतुर चकोरी चंदा चाके
मोर प्रीत अमावस, छायो


कसक-कसक मसक गयी अंगिया
बे हया,  हिया  हकलायो
अंग अनंग, मारे पिचकारी
पोर पोर भीग जायो


जुलमी फागुन! पिया न आयो.


बलम नादान, परदेस नोकरिया
तन संग, सौ-तन, रंगायो
भरम सरम,नैनन, भये नम
मन मोर, पिया जगायो.


कोयली कुहके,पपीहा पिहुके
पल पल अँखियाँ फरके
चिहुँक-चिहुँक मन दुअरा ताके
पिया, न पाती कछु पायो


बरसाने मुरझाई राधा
कान्हा, गोपी-कुटिल फंसायो
मोर पिया निरदोस हयो जी
फगुआ मन भरमायो


जुलमी फागुन! पिया न आयो.