Monday, 18 September 2017

आज जो जोगन गीत वो गाऊं.

अधरों के सम्पुट क्या खोलूं ,
मूक कंठों से अब क्या बोलूं.
भावों की उच्छल जलधि में,
आंसू से दृग पट तो धो लूँ .

अँखियन सखी छैल छवि बसाऊं,
पुलकित तन भुजबन्ध कसाऊं.
प्रिया प्रीत सुर उर उकसाऊं,
आज जो जोगन गीत वो गाऊं.

विरह चन्द्र जो घुल घुल घुलता,
गगन प्रेम पूनम पय धुलता.
बन घन घूँघट मुख पट छाऊँ,
आज जो जोगन गीत वो गाऊं.

बन जुगनू जागूं जगमग कर,
रासूं राका संग सुहाग भर.
राग झूमर सोहर झुमकाऊँ,
आज जो जोगन गीत वो गाऊं.

प्रेम सघन वन पायल रुन झुन,
धुन मुरली मोहन की तू सुन।
बाँसुरिया पर तान चढ़ाऊँ,
आज जो जोगन गीत वो गाऊं!

जग जड़  स्थूल  स्थावर  में,
सूक्ष्म चेतन  जंगम को जगाऊँ.
गुंजू अनहद नाद पुरुष बन,
आज जो जोगन गीत वो गाऊं.


Wednesday, 6 September 2017

'पूरा सच'

शफ्फाक श्वेत साया,
एक कलपती काया.
सरकी सपने रात,
झकझोरा, जगाया.

कहा, सोये हो!
भाई, उठो जागो.
बांधो बैनर, मोमबती
जुलुस में भागो.

दाभोलकर, पानसेर, कलबुर्गी,
फट फ़टाफ़ट हैटट्रिक!
फिर कन्नड़काठी कलमकार,
गौरी लंकेश पैट्रिक!

कल मुझे सुलाने पर,
गर तुम न सोते!
फट फटा फट फिर,
विकेट यूँ न खोते!

'पंथी' नहीं था मैं,
लो, मान लिया भाई.
चलो, ये भी माना,
लोकल, छोटा पत्रकार कस्बाई.

पर घर की आबरू,
भाई, सब पर भारी.
या लूटना ललना को,
राम-रहीम की लाचारी!

मेरा क्रांतिकारी कद!
कसम से कसमसाया.
पर पुचकार के पूछा,
तुम कौन! किसने बुलाया?

साया सुगबुगाया, फुसफुसाया,
आवाज फुटती, बुझती......
......मै! 'पूरा सच'
रामचन्द्र छत्रपति!

Sunday, 3 September 2017

सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।

'मनोहर पोथी' के ककहरा से माथा पच्ची करने के उपरांत हमारा मासूम बालपन  'रानी,मदन अमर' के साथ हिंदी की शब्द रचना और वाक्य विन्यास की उलझनों में हुलसता. किसी सुगठित साहित्यिक पद्य रचना से सामना तो स्कूल में होने वाली नित्य प्रातर् कालीन प्रार्थना से ही हुआ. ये बात अलग है कि बाल मन उस प्रार्थना के मर्म को नहीं समझता पर उसके कोरस के सरस  और लय की ललित धारा में नहाकर अघा जरुर जाता. वे दो छात्र और छात्राएं जो इस कोरस गान का नेतृत्व करते मेरे मन में अपनी आराध्य छवि बना लेते. बाद की कक्षाओं में प्रतिभा मूल्याङ्कन के दो ही पैमाने चलन में देखे गए. एक गणित के प्रश्नों को कौन पहले सुलझा लेता, दूसरा क्लास में खड़ा होकर अपने शुद्ध उच्चरित स्वर में बिना किताब देखे कौन कविता पाठ कर अपने अद्भुत आत्म विश्वास का शंखनाद कर दे. बाद में इन कतिपय आत्म विश्वासी वीरों और वीरांगनाओं के ओजस्वी उद्घोष से उत्साहित मास्टर साहब शेष कक्षा को अपनी छड़ी से कविता नहीं रट पाने की पराजय की पीड़ा का कड़वा घूंट पिलाते या कभी कभी बेंच पर खडा करा के 'दर्शनीय' बना देते. बाद में संस्कृत के शब्द रूपों ने दर्शनीयता की इस दशा को और दारुण बना दिया. रहीम की ये पंक्तियाँ तो प्रिय लगती थी कि:
रहिमन मन की वृथा मन ही राखो गोय
सुनी अठिलैहें लोग सब बाँट न लिहें कोय
                   परन्तु उस वेदना को भला मन में कोई कैसे रख पाता जिसे मास्टर साहब की लहराती छड़ी का कोमल हथेलियों से तड़ित ( और त्वरित भी!) स्पर्श आँखों से बरसा कर सार्वजनिक कर देता! मानव जीवन में पुरुषार्थ का सबसे स्वाभिमानी आश्रम होता है बालपन!
हाँ, एक और पैमाना जुड़ गया प्रतिभा के मूल्याकन का. वह था, हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद. हिन्दी की कविताएँ कंठस्थ करने वाले की अपनी अहमियत जरुर थी, लेकिन हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करने में दक्ष कलाकार के आगे वह पानी भरता नज़र आता. बहुत बाद में पता चला कि शिक्षा के इस शैशव सत्रीय प्रशिक्षण के ठीक उलट व्यावहारिक तौर पर असली जीवन में हमारे देश में अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की परम्परा ज्यादा पुष्ट और व्यापक है. अर्थात, ऊपर सब कुछ अंग्रेजी में. संविधान, कोर्ट-कचहरी, विज्ञान, तकनिकी शिक्षा, मेडिकल की पढ़ाई, सब कुछ अंग्रेजी में. उसकी जो  बूंदे हिंदी में रूपांतरित होकर नीचे टपकती हैं उसीको स्वाती सदृश नीचे का हिन्दी भाषी चातक छात्र चखकर अपने ज्ञान का मोती गढ़ लेता है. और तो और, सुनते है, १९४९ में सितम्बर के इसी पखवाड़े में संविधान सभा में हिंदी को राज भाषा बनाने के लिए अंग्रेजी में अद्भुत बहस हुई थी. और अंत में मात्र एक वोट के अंतर पर इस पर मुहर लगी. फिर, अध्यक्ष राजेन बाबु के अध्यक्षीय भाषण ने अपनी फर्राटेदार अंग्रेजी में हिंदी को ' 15 '  वर्षों  के लिए राज सिंहासन पर बिठाया.   
                        मै कक्षा दर कक्षा बढ़ता गया. वचन से लिंग , लिंग से संधि, संधि से समास , समास से कारक , कारक से आशय और आशय से सप्रसंग व्याख्या - इन व्यूहों से निरंतर घिरता चला गया. मैट्रिक तक आते आते तीन पुस्तकों, कहानी संकलन, गद्य संकलन और पद्य संकलन, ने मानों हिन्दी साहित्य के मूल धन की अपार थाती को सँभालने का उत्तरदायित्व मुझ पर ही निर्धारित कर दिया. ऊपर से चक्रवृद्धि ब्याज के रूप में एक निबंध संग्रह- 'जीवन और कला'. पहला निबंध हजारी प्रसाद द्विवेदी का - ' नाख़ून क्यों बढ़ते हैं '. मानों ये नाखून जीवन में हमें घेरने वाले अवसाद का साक्षात् प्रतिनिधित्व कर रहे हों.  साहित्य का इतिहास, कविता के वाद , अलंकार, छंद विधान, शब्द शिल्प - ये सब एक साथ मिलकर मेरे तेजस्वी छात्र जीवन के माधुर्य, ओज और प्रसाद को सोखने लगे. भाषा को पकड़ता, भाव फिसल जाते. भावों को ताड़ता , भाषा उलझ जाती. रटने की क्षमता का हरण करने के बाद ही परम पिता ने मुझे सांसारिक पिता के हाथों सौंपा था ! कोटेशन, कविता याद होते नहीं. वर्तनी का बरतन बिल्कुल साफ़ था. बोर्ड परीक्षा के पहले  'सेंट-अप' टेस्ट होता और उससे पहले ' प्री-टेस्ट '. हिंदी के शिक्षक और प्रकांड विद्वान् डॉक्टर शिव बालक शर्मा प्रसिद्द साहित्य मनीषी फादर कामिल वुल्के के शोध शिष्य रह चुके थे और इस बात को प्रमाणित करने में उनकी प्रतिबद्धता के पारितोषिक रूप में  प्रति दिन न जाने कितने छात्र उनकी पतली छड़ी के मोटे दोदरे अपनी पीठ पर लेकर घर लौटते.
                              'प्री-टेस्ट' का रिजल्ट आया. मै फेल. पूर्णांक १००, उत्तीर्णांक ३३ और प्राप्तांक २७! पहली बार आभास हुआ कि स्थूल शरीर भी हल्का और सूक्ष्म मन भी भारी हो सकता है. जीवन के इस नव दर्शन का विषाद योग लिए घर पहुंचा जहां मेरे न्यायाधीश पिता का 'ऑस्टिन का संप्रभु न्याय-दर्शन' मेरी खातिरदारी की सारी जुगत लेकर पहले से विराजमान था. उन्होंने मन के भारीपन को उतारकर फिर से शरीर के पोर पोर में समा दिया. मुझ पर बरसे दुस्सह दंड की प्रताड़ना के ताप से पिघला तरल मेरी माँ की आँखों में छलका. ये छलके नयन मानों मुझे बौद्धिक कायांतरण की चुनौती दे रहे हों. मै सहमा स्थावर खडा रहा. किन्तु भला समय का पहिया क्यों रुकता! हिंदी के आचार्य डॉक्टर सुचित नारायण प्रसाद का प्रसाद मिला. गुरु के आशीष की छाया में पनपता रहा. बोर्ड परीक्षा में मुझे हिंदी में ७० प्रतिशत अंक आये जो उस जमाने के लिए असाधारण बात होती थी. जिला स्कूल मुंगेर की चाहरदीवारी पार कर पटना साइंस कॉलेज होते हुए इंजीनियरिंग पढने रुड़की पहुच गया. डॉक्टर जगदीश नारायण चौबे, डॉक्टर राम खेलावन राय, प्रोफेसर अरुण कमल(साहित्य अकादमी प्रसिद्धि के प्रख्यात कवि), प्रोफेसर शैलेश्वर सती प्रसाद जैसे स्वनामधन्य शिक्षकों की ज्ञानसुधा का सरस पान सुख मिला. रुड़की आते आते इन गुरुओं ने भाषा और साहित्य का इतना अमृत घोल दिया था कि अब हिंदी की अस्मिता की लड़ाई में शामिल हो गया. हिंदी प्रायोगिक विकास समिति का गठन हुआ. मै कार्यकारिणी का सदस्य बना. हिंदी दिवस समारोह में कैम्पस में अतिथि रूप में पधारे डॉक्टर राम कुमार वर्मा, डॉक्टर विद्यानिवास मिश्र सरीखे हिंदी के बोधि वृक्ष का सानिध्य गौरव मिला. राम कुमार वर्मा जी ने कसम खिलाई- हस्ताक्षर हिंदी में करेंगे. आज तक कसम नहीं टूटी . रूडकी देश का पहला इंजीनियरिंग संस्थान बना जहां अंगरेजी की जगह वैकल्पिक रूप से सेमेस्टर में हिंदी की पढ़ाई की व्यवस्था की गयी. डॉक्टर आशा कपूर हमारी प्रोफेसर रहीं जिनकी अपार ममता और आशीष हम पर बरसे. सबसे पहला पी एच डी शोध पत्र धातु अभियांत्रिकी में हिंदी में इसी संस्थान ने स्वीकृत किया. बाद में अपने अभूतपूर्व संघर्ष की बदौलत श्याम रूद्र पाठक ने आई आई टी दिल्ली में अपना शोध पत्र हिन्दी में स्वीकृत कराने में सफलता पाई. अभी संघर्ष विराम का समय नहीं आया था. पुर्णाहूति तब हुई जब बाद में संघ लोक सेवा आयोग ने अपनी परीक्षाओं में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को माध्यम के रूप में स्वीकार किया.
                                   संघ लोक सेवा आयोग में इंजीनियरी सेवा की मेरी अतर्वीक्षा (इंटरव्यू) थी. डॉक्टर जगदीश नारायण का बोर्ड था. आई आई टी दिल्ली के प्रोफेसर नटराजन साहब सदस्य थे. उन्होंने उन दिनों हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के लिए चल रहे संघर्षों पर चुटकी ली. मै भला क्यों चूकता ! मै उनसे उलझ गया. मैंने स्पष्ट शब्दों में अपने तर्कों को उनके समक्ष रखा. अब वे उस शेर की मुद्रा में आ गए जिसकी ललचायी निगाहें  जलप्रवाह के निचले छोर पर जल पीने वाले मेमने में मुझे निहार रही हो! भला हो चंपारण का, जो मेरी जन्म भूमि है . उन्होंने मुझे घेरने के लिए चंपारण आन्दोलन का इतिहास उकटना शुरू किया.मै कहाँ भला उकताता! लेकिन आपको उकताने से बचाने के लिए मै पूरी कहानी सुनाये बिना ये बता दूँ कि बोर्ड के अध्यक्ष जगदीश नारायण साहब ने मुझे लोक लिया और मै थोडा सशंकित किन्तु विजयी मुद्रा में बाहर आया.
आज हिंदी पखवाड़े में शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर उन समस्त गुरुजनों को याद करते मन में एक अजीब हलचल हो रही है. उनका आशीर्वाद आज भी खूब फल फूल रहा है. अनुभव सर्वदा ज्ञान से श्रेष्ठ रहा है . मेरे जीवन में आये ऊपर वर्णित व अवर्णित सभी पात्र मेरे जीवन पथ को आलोकित करने वाले मेरे पूज्य गुरु रहे हैं और मेरे अनुभव का पोर पोर  उनके आशीष से सिक्त है. वह पल पल मेरी स्मृतियों में सजीव रहेंगे और उपनिषद् की ये पंक्तियाँ उस जीवन्तता में अपना अनुनाद भरती रहेंगी:-
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । 

Saturday, 26 August 2017

ताड़ना के अधिकारी

शिशु की हरकत और  उसके हाव भाव देख माँ ने उसके अन्दर के हलचल को अनायास ताड़ लिया कि भूख लगी है और उसे दूध पिलाने लगी. दूध पिलाने से पहले माँ द्वारा किये जाने वाले उपक्रम और चेष्टाओं की गतिविधियों से शिशु ने भी ताड़ लिया कि उसके स्तन पान की तैयारी चल रही है और शिशु शांत हो गया.एक दूसरे को समझने में जच्चा और बच्चा पारंगत है. उनका पारस्परिक तादात्म्य मनोवैज्ञानिक और आत्मिक स्तर पर है, जिसकी अभिव्यक्ति  'हम'  'आप'  इस पयपान की प्रक्रिया में देख पाते हैं. एक दूसरे को समझने के इस टेलीपैथिक समीकरण को हम ' ताड़ना ' शब्द से अभिहित करते हैं.

                                             ताड़ने की यह प्रक्रिया मनोविज्ञान के सूक्ष्मातिसूक्ष्म धरा पर सम्पन्न होती है. यहाँ कर्ता और कर्म एक दूसरे से ऐसे घुल मिल जाते हैं कि उनमे स्वरूपगत कोई मानसिक भेद नहीं रह पाता. दोनों चेतना के स्तर पर एकाकार हो जाते हैं. कर्ता और कर्म का भेद मिट जाता है. कर्ता कर्म और कर्म कर्ता बन जाता है. दोनों की चेतना का समाहार हो जाता है. दोनों का एक दूसरे के प्रति समर्पण का भाव तरल होकर साम्य की ऐसी स्थिति को प्राप्त कर लेता है कि किसके भाव का प्रवाह किसकी ओर हो रहा है, इस भाव का अभाव हो जाता है और दोनों की चेतनाओं का समागम एक स्वाभाविक निर्भाव की स्थिति को प्राप्त हो जाता है. यहाँ एक का संकेत दूसरे में चेष्टा का स्फुरण और दूसरे का संकेत पहले में चेष्टा का स्फुरण कर देता है. दोनों एक स्वचालित समभाव की स्थिति में आ जाते हैं और भावों की यह एकरूपता इतनी गाढ़ी होती है कि भौतिक संवाद के सम्प्रेषण की कोई गुंजाइश शेष नहीं रह जाती. कर्म के समस्त अवयव कर्ता में और कर्ता के समस्त तंतु कर्म में समा जाते हैं. भावों की प्रगाढ़ता का  यौगिक घोल सहज साम्य की ऐसी विलक्षणता का रसायन पा लेता है कि भाषा गौण नहीं, प्रत्युत मौन हो जाती है.अंगों की झटक, नैनों की मटक, हाव-भाव, स्वर की तीव्रता या मंदता, गात का प्रकंपन , होठों की थिरकन, चेहरे का विन्यास और भावों के सम्प्रेषण के समस्त तार - ये अभिव्यक्ति के तमाम लटके झटके हैं जो मनश्चेतना के महीनतम स्तर पर संचरित होकर अंतर मन से आत्यंतिक संवाद स्थापित कर लेते हैं और एक लय, एक सुर और एक ताल बिठा लेते हैं.

                                                पदार्थ विज्ञान का यह सत्य है कि प्रत्येक पदार्थ की अपनी एक चारित्रिक मूल आवृति होती है, जो उसकी परमाण्विक संरचना का फलन होती है. साथ ही, प्रत्येक पदार्थ अपनी प्रकृति में पदार्थ और उर्जा का द्वैत स्वभाव धारण करता  है. अर्थात, वह स्वरुप  पदार्थ के द्रव्यमान और उर्जा की आवृति रूप में द्वैत आचरण करता है. ऊर्जा उसकी सूक्ष्म आवृति है, तो पदार्थ स्थूल आकृति.  जब दो अलग पदार्थों की अपनी संरचनात्मक स्वाभाविक आवृति समान या समानता के आस पास होती है और दोनों प्रकम्पन की समान कला में होते हैं तो दोनों के मध्य रचनात्मक व्यतिकरण  (constructive interference ) होता है और दोनों के आयाम जुड़ जाते हैं. प्रकम्पन का प्रभाव द्विगुणित हो जाता है. सुर, ताल, लय सभी मिल जाते हैं. इसे अनुनाद की स्थिति कहते हैं. यहाँ दोनों पदार्थ आपस में पूर्ण तादात्म्य या यूँ कह लें,  कि  "कम्पलीट हारमनी" में होते हैं .

                                                  मेरा मानना है कि यहीं ऊर्जा मनोविज्ञान में अपनी सूक्ष्मता और स्वरुपगत वैविध्य के अलोक में चेतन , अवचेतन या निश्चेतन मन का उत्स होती है. ' कम्पलीट  हारमनी '  की स्थिति में चेतना , अवचेतना और निश्चेतना की  तीनों कलाओं में दोनों पदार्थ अभेद की स्थिति में आ जाते हैं. दोनों सर्वांग  भाव  से एक दूसरे के प्रति ' चेत ' गए होते हैं. अर्थात,  यहीं वह बिंदु है जहां एक पदार्थ की चेतना दूसरे की चेतना के प्रति ' चेतना ' आरम्भ कर देती है और फिर दोनों एक दूसरे की  " 'ताड़ना' के अधिकारी" बन जाते हैं.वादक वाद्य की और वाद्य वादक की, सुर गाने की और गाना सुर की, गायक वादक की और वादक गायक की, वैज्ञानिक उपकरण की और उपकरण वैज्ञानिक की, रचनाकार रचना की और रचना रचनाकार  की, कवि श्रोता की और श्रोता कवि की,चरवैया गाय की और गाय चरवैया की, माँ शिशु की और शिशु माँ की, पत्नी पति की और पति पत्नी की, गुरु शिष्य की और शिष्य गुरु की, स्वामी भक्त की और भक्त स्वामी की ...........  आत्मा परमात्मा की और परमात्मा आत्मा की; इस जीव-ब्रह्म  द्वैत के दोनों तत्व एक दूसरे की 'ताड़ना के अधिकारी ' बनकर एक दूसरे को ताड़ने लगते है और उनके आपसी विलयन की प्रक्रिया पूर्ण होने लगती है,  जिसका गंतव्य है 'अनुनाद' की स्थिति को प्राप्त करना, दोनों के स्वरूपगत भेद का मिट जाना. परमात्म विभोर हो जाना !

                                             ठीक वैसे जैसे ढोलकिया ढोलक के रस्से को तबतक तान तानकर अपनी थाप से  तारतम्य मिलाता है जबतक उसे अपने संगीत का अनुनाद न सुनाई दे. ढोलक के ताड़ते ही ढोलकिया भंगिमा की  चेतना में उससे एकाकार हो जाता है.चेतना के सूक्ष्म स्तर पर जुड़ते ही संवेदना के महीन महीन धागे मोटे मोटे दिखने लगते हैं और आस्तित्व का द्वैत संवेदना के अद्वैत में परिणत हो जाता है. समर्पण, सरलता और निःस्वार्थ अभिव्यक्ति का मौन एक दूसरे में ऐसे समा जाता है कि सजीव निर्जीव हो जाता है और निर्जीव सजीव, विद्वान् गंवार बन जाता है और गंवार विद्वान, सेवक स्वामी बन जाता है और स्वामी सेवक, राम हनुमान बन जाते हैं और हनुमान राम, शिव शक्ति बन जाते हैं और शक्ति शिव !  निश्छल, निर्विकार और योगस्थ आत्म समर्पण की पराकाष्ठा ही ताड़ने की इस प्रक्रिया को प्रभावी बनाती है और उच्च परिमार्जित आत्मसंस्कार से ही इन्हे ताड़ा जा सकता है.

                                            हाँ,  जहां कलुषित आत्म संस्कार हों और भावों का मनोविज्ञान विकृत हो तो तत्वों की पारस्परिक कलाएं प्रतिद्वान्दत्मकता  से पीड़ित हो उठती हैं . फिर व्यतिकरण भी विध्वंसात्मक (destructive interference) ! और, जीवन के चित्रपट का स्पेक्ट्रम काले धब्बों से भर जाता है. ताड़ना प्रताड़ना बन जाती है!

                                          आइये, अब हम तुलसी के इन  दोहों के मर्म तलाशने की वर्जिश करें!

" ढ़ोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी,
   सकल ताड़ना के अधिकारी !!!"

Thursday, 24 August 2017

ब्रह्म योग

सपनों की सतरंगी सिंदूरी,
सुघड़ नयन घट घोले .
छन-छन छाया छवि की
क्षण-क्षण, मन-पनघट में डोले.

अभिसार-आँचल-अनुराग,
आरोह-अनंत अवनि का,
अंग-अनंग , अम्बर-सतरंग
अनावृत    यवनिका.

छाये क्षितिज अवनि और अम्बर,
अनहद आनंद आलिंगन.
सनन सनन कण पवन मदन बन,
चटक चाँदनी चन्दन .

दुग्ध-धवल अंतरिक्ष समंदर,
चारु चंद्र चिर चंचल चहके.
चपल चकोरी चातक चितवन,
प्रीत परायण पूनम महके .

नवनिहारिका नशा नयन मद,
प्रेम अगन सघन वन दहके .
सुभग सुहागन अवनि अम्बर,
बिहँस विवश बस विश्व भी बहके.

क्रीड़ा-कंदर्प कण-कण-प्रतिकम्पन,
उदान  अपान  समान .
व्यान परम पुरुष प्रकृति भाषे,
ब्रह्म योग  चिर प्राण .


Saturday, 19 August 2017

उत्सर्ग उत्सव

तारसप्तक  मन्द्र सा
चिर प्रीत पूनम चन्द्र सा
सरित स्मित धार सा
तू शब्द मै ॐकार सा

मै मार्तंड तू ताप सा
मै मृदंग तू थाप सा
मै नींद तू नीरव निशा
तू जीवन मै जिजीविषा

ये प्रीत पथ अनंत का,
अदृश्य दिग दिगंत सा .
विश्व मै तू जीव सा,
बस ढाई आखर पीव का.

है न दैहिक और न भौतिक,
परा, अपार, पारलौकिक.
अश्रु के प्रवाह में,
भाव तरल अथाह ये.

डूबते यूँ जाएँ हम,
न तू-तू मै-मै और ख़ुशी गम.
दूर क्यों होना है गुम,
आ, हो समाहित हममें तुम

हो आहुति मेरे ' मैं ' की,
और तुम्हारे ' तू ' का क्षय.
आत्म का उत्सर्ग उत्सव,
चिर समाधि अमिय अक्षय. 

Saturday, 15 July 2017

अहल्या अस्थान- अहियारी

बिसपी गाँव से वापस सीतामढ़ी की ओर बढे मुश्किल से आठ या दस किलोमीटर भी नहीं हुए थे कि सड़क की बायीं ओर कमतौल स्टेशन जाने की दिशा में लगी एक पट्टिका ने अचानक मेरे मन को खींच लिया. पट्टिका पर तीर के दिशा-निर्देशक चिन्ह के साथ लिखा था ' अहल्या अस्थान'. दिशा सन्देश पढ़ते ही बरबस हमें महाकवि तुलसी की इन पंक्तियों का स्मरण हो आया :-
'गौतम नारी श्राप वश उपल देह धरी धीर,
चरण कमल राज चाहति कृपा करहु रघुबीर.'
                ताड़का, मारीच और सुबाहु का संहार करने के पश्चात मुनि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को धनुष यज्ञ दिखने मिथिला नरेश राजर्षि जनक की राजधानी जनकपुर इसी रास्ते ले जा रहे थे. अत्यंत रमणीक यह वन प्रांतर निरभ्र, शांत, पशु-पक्षी विहीन और निर्जन था. एक सुनसान आश्रम था जहाँ एक भी मुनि दृष्टिगोचर नहीं होने पर राम ने कुतूहल वश विश्वामित्र से निर्जनता के इस रहस्य के विषय में प्रश्न किया. गाधि पुत्र विश्वामित्र ने फिर उस सुनसान आश्रम की कहानी सुनाई. बहुत वर्ष पूर्व यह गौतम ऋषि का आश्रम था जहाँ वह अपनी पतिव्रता यशस्विनी पत्नी अहल्या के साथ तपश्चर्या कर्म करते थे. देवराज इंद्र  चन्द्रमा के साथ मिलकर छल से गौतम का वेश बनाकर रात्रि प्रहर में अहल्या के समक्ष समागम को प्रस्तुत हुए. समागम के पश्चात गौतम के द्वारा पकडे जाने पर इंद्र और अहल्या दोनों उनके शापभाजन बने. अहल्या को उन्होंने शाप दिया कि वह कई हज़ार वर्षों तक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाते हुए राख में समस्त प्राणियों से अदृश्य रहकर पड़ी रहेगी.जब राम का इस आश्रम में पदार्पण होगा उस समय वह पवित्र होगी और उनके आतिथ्य सत्कार से उसके समस्त ऐन्द्रिक और मानसिक दोष दूर हो जायेंगे. फिर वह अपना पूर्व शरीर धारण कर लेगी. ऐसा शाप भंजन कर कुपित गौतम हिमालय पर तपस्या करने चले गए.
अब राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र के साथ उस आश्रम में प्रवेश किया. मनुष्य, देव और असुरों को अदृश्य अहल्या को राम ने देखा - महासौभाग्यशालिनी अहल्या अपनी तपस्या से देदीप्यमान हो रही थी. श्री राम का दर्शन हो जाने से जब उनके शाप का अंत हो गया तो वह सबको दिखाई देने लगी. राम और लक्ष्मण ने उनके चरण स्पर्श किये. अहल्या ने उनका आतिथ्य-सत्कार किया और शापमुक्त होकर अपने दिव्य रूप में अपने पति गौतम का साहचर्य ग्रहण किया.
               ये कहानी मैंने वाल्मीकि रामायण में पढ़ी थी. हालांकि तुलसी के रामचरितमानस तक आते आते अहल्या पत्थर की बन चुकी थी और वाल्मीकि रामायण में उनका चरण स्पर्श करने वाले राम यहाँ अब अपने चरणों के स्पर्श से उनका उद्धार करने लगे थे. यह आदि काल से मध्य कल तक की हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा के प्रदुषण की प्रक्रिया की राम गाथा है. हालांकि, इस विषय पर न मेरा कभी वाल्मीकि से मतैक्य रहा और न तुलसी से ही; और न उन तमाम अहल्या-इंद्र-गौतम प्रसंगो से जो पद्मपुराण , विष्णु पुराण या अन्य पौराणिक ग्रंथो में यत्र तत्र कपोल कल्पित मिथ्या मिथकों का गाल बजा रहे हैं. अपनी अटूट आध्यात्मिक और पावन परंपरा में हम जिन पञ्चकन्यायों को पूजते हैं वे सभी- कुंती, तारा, मंदोदरी, द्रौपदी और अहल्या - अपने समय की फेमिनिस्ट थी . उन्होंने तत्कालीन नारी विरोधी मान्यताओं को चुनौती दी तथा वे सारे कार्य संपन्न किये जो पुरुष समाज के मिथ्या अहंकार को तार तार कर देते हों. हमें तो यही लगता है कि वैदिक युग के बाद जब मर्यादाओं का अवनयन काल आया तो कुटिल प्रवंचकों ने पुराण की रचना करते समय अपनी थोथी दलीलों को अपने ग्रंथों में थोप दी. नारी को पुरुष से नीचा रखने का सारा कुचक्र रच दिया. बातों को तोड़ मरोड़कर कुतर्कों का जाल फैला दिया. परम पूजनीय पञ्चकन्यायों को प्रपंच पूर्ण प्रसंगों के प्रकारांतर में पातकी प्रमाणित कर दिया और प्रताड़ित भी किया. और तो और , शाप के प्रकोप के निवारण में भी ऐसा विधान रचा कि पुरुष इंद्र का शाप अंग प्रत्यारोपण से छू मंतर हो गया ! जबकि, नारी अहल्या को अप्रमेय प्रक्रिया से पाषाण में परिवर्तित कर दिया !
              प्रमाण , प्रमेय , अनुमान , सिद्धांत आदि ... ये सब न्याय दर्शन के आवश्यक अंग हैं. और न्याय दर्शन के जनक मुनि अक्षपाद गौतम अपनी पत्नी को पत्थर बना देने में स्वयं अप्रमेयता का आखेट बन जाते हैं ! कैसी बिडम्बना है हमारे पौराणिक कथाकारों के साथ! इंद्र देवराज हैं. परस्त्रीगमन करते हैं. इंद्र अहल्या के पास गए थे न! अहल्या तो अपने आश्रम में ही थी. सह षड्यंत्रकारी चन्द्रमा है. इंद्र पुरुष! चन्द्रमा पुरुष! न्यायी पति गौतम पुरुष! और पुरुषार्थ के प्रतीक-पुरुष इंद्र को शाप से मुक्ति की तरकीब सिखाने वाले सारे पंडित, ब्रह्माजी भी, पुरुष! इन सब पुरुषों के बीच एक पाषाणी नारी- अहल्या!
              थाईलैंड में प्रचलित रामकथा, रामकिन, में तो यहाँ तक रच दिया गया है कि सूर्य और इंद्र के समागम से अहल्या ने सुग्रीव और बाली को जन्म दिया जिसका भांडा अहल्या की पुत्री अंजनी ने अपने पिता के सामने फोड़ा. उससे कुपित होकर गौतम ने दोनों पुत्रों को बन्दर बनाकर घर से निकाल दिया. फिर अहल्या के शाप से अंजनी को भी बन्दर रूप पुत्र हनुमान हुए. कुल मिलाकर, नारी इन समस्त प्रपंचों की प्रयोगशाला बनी रही. पुरुष प्रयोग करता रहा!
                विश्वामित्र और राम लक्ष्मण के जनकपुर पहुचते ही अहल्या के बेटे शतानन्दजी जो राजा जनक के राजपुरोहित हैं, पहला प्रश्न यहीं पूछते हैं - " मुनिवर! मेरी यशस्विनी माता अहल्या बहुत दिनों से तपस्या कर रही थी. क्या आपने राजकुमार श्री राम को उनका दर्शन कराया? क्या मेरी महातेजस्विनी एवं यशस्विनी माता अहल्या ने वन में होने वाले फल फूल आदि से समस्त देह धरियों के लिए पूजनीय श्री रामचन्द्रजी का पूजन किया? क्या अपने श्री राम से वह प्राचीन वृतांत कहा था , जो मेरी माता के प्रति देवराज इंद्रा द्वारा किये गए छल-कपट एवं दुराचार द्वारा घटित हुआ था?"
              तो छल इंद्र का! सहषड्यंत्र चन्द्रमा का! दण्ड गौतम के न्याय का! और पत्थर की प्रतिमा अहल्या की! और तो और, ये आँखों देखा हाल सुनाने वाले विश्वामित्रजी ने भी एक अन्य धारावाहिक में इंद्र की ही छल क्रीडा में रम्भा को दस हज़ार वर्षों तक पत्थर की प्रतिमा बना कर खडा करा चुके थे!
              हमने इन प्रसंगों के बाद आधुनिक युग में यशस्वी लोगों की लन्दन में तुशाड की प्रतिमा के बारे में जरुर सुना है लेकिन अभी तक किसी ऐसी प्रावैधिकी से मेरा साक्षात्कार नहीं हुआ जहां सजीव प्राणी को निर्जीव पाषण प्रतिमा में परिवर्तित कर पुनः उसे वापस पूर्ववत सजीव रूप में ला दिया जाय. अर्थात पहले रासायनिक परिवर्तन, और फिर दूसरा प्रतिगामी रासायनिक परिवर्तन और दोनों मिलकर एक पूर्ण भौतिक परिवर्तन! बीच का काल हरिकीर्तन! प्रसिद्द बंगाली फिल्मकार सुजय घोष ने अपनी कल्पनाओं की अहल्या कथा पर चौदह मिनट का एक लघु वृत्त चित्र 'अहल्या' भी बनाया है.
              मेरा अभिप्राय इन मिथकों का मज़ाक उडाना नहीं, प्रत्युत उनकी अवैज्ञानिकता, नारी विरोधी कुत्सित कुसंस्कारों और  सामंती मान्यताओं  को अस्वीकार करना भर है.                
              इस बार हमें गाडी वापस लौटाने की नौबत नहीं आयी क्योंकि हमारे वाहन चालक महोदय ने पहले से ही हमारी भावनाओं को ताड़ लिया था. उन्होंने गाड़ी को अहियारी गाँव की ओर मोड़ दिया था. और जितनी देर तक हम अपने विचारों में डूबते उतराते रहे हमारी गाड़ी घनघोर विशाल वृक्ष की सघन शीतल छाया तले तपस्विनी अहल्या के 'अस्थान' में प्रवेश कर चुकी थी. वहाँ हमें एक आत्यंतिक नैसर्गिक सुख का आभास हुआ. हमने मंदिर के प्रशांत प्रांगण में चबूतरे पर थोड़ी देर  तक 'शांत अमिताभ' मुद्रा में विश्राम किया. मंदिर का जालीदार द्वार यहाँ भी बंद था जिसके पार माँ अहल्या की प्रतिमा दृश्यमान थी. एक धातु पट टंगा था जिसपर लिखा था - " ' अहल्या कुटी ', ऐसा प्रमाणित है कि यहीं पर माँ अहल्या ऋषि गौतम के शाप से पाषाणी हुई थी, जो श्री राम के चरण स्पर्श से शाप मुक्त हुई थी." मंदिर की दीवार रामचरितमानस की अहल्या विषयक चौपाइयों और दोहों से पटी थी.
                मुख्य मंदिर के ठीक सामने आँगन में एक स्तम्भ गड़ा था जिस पर लिखा था - " संस्थापक , गुंटूर आंध्र प्रदेश के श्री श्री श्री त्रिदंडी श्रीमन्नारायण स्वामी. इस श्री राममहाक्रतु: स्तम्भ में एक करोड़ राम यंत्र और मूल रामायण विद्यमान है. इसकी स्थापना  १९६० के दशक में की गयी. यह स्थान वैष्णव मतावलंबियों के द्वारा विवाह , अनुष्ठान , रामार्चा, सत्यनारायण एवं श्राद्ध कर्म के लिए मंगलकारी है ." इन पंक्तियों ने वैष्णव दर्शन के इस मर्म का साक्षात्कार कराया कि श्राद्ध का भी मंगलकारी होना इस बात का प्रतीक है कि जीवात्मा का जन्म-मरण के भवसागर से मुक्त होकर परमात्म विलय की मोक्षवास्था को प्राप्त हो जाना ही समस्त मंगल का मूल है.
                समीप के कमरे में भोजन बना रही एक महिला पुजारी ने आग्रह करने पर बड़ी आत्मीयता से मन्दिर का दरवाज़ा खोलकर दर्शन कराया. वहीँ पर एक बालक अपनी माँ के साथ पूजा सामग्री की दुकान लगाये बैठा था जिसपर अन्य सामग्रियों के साथ चूड़ी और बैगन रखे थे. पूछने पर पता चला कि ' अईला ' नमक एक विशेष प्रकार के दानेदार चर्मरोग के रोगी यहाँ माँ अहल्या का पुजन कर यहाँ की मिट्टी अपने रोग ग्रस्त भाग पर लगाते हैं जिससे यह बीमारी दूर हो जाती है. रोगमुक्त होने पर बैगन को चढ़ावे के रूप में अर्पित किया जाता है. मैंने मन ही मन मिट्टी की मरहमी ताकत को नमन किया. इसी बीच सजी संवरी महिलाओं के एक झुण्ड ने एक नवविवाहित वर वधु के जोड़े के साथ सुमधुर स्वर में समवेत विवाह के गीत गाते प्रवेश किया. हमने माँ अहल्या को प्रणाम किया और उनकी उसी छवि की आभा को अपनी आँखों में बसाये वहां से विदा लिया जो छवि भगवान राम ने अदिकवि वाल्मीकि के वर्णित इन छंदों में की थी :-

"स तुषार आवृताम् स अभ्राम् पूर्ण चन्द्र प्रभाम् इव |
मध्ये अंभसो दुराधर्षाम् दीप्ताम् सूर्य प्रभाम् इव ||

अर्थात
 " तप से देदीप्यमान रूप वाली, बादलों से मुक्त पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा के समान तथा प्रदीप्त अग्नि

 शिखा और सूर्य से तेज के समान अहिल्या तपस्या में लीन थी।"

Saturday, 8 July 2017

उगना के मालिक - विद्यापति

"घन घन घनन घुँघर कत बाजय
हन हन कर तुअ काता
बिद्यापति कवि तूअ पद सेवक
पुत्र बिसरी जनु माता..."
 श्री हनुमान सतबार पाठ समारोह में कीर्तन गायन की तैयारी के क्रम में 'माइक चेक' करते मेरे शतकवय बाबा (दादाजी) ने बिना किसी साज संगीत के जब इन पंक्तियों की तान भरी तो मैं अनायास पवन तरंगों पर तैरती इन मधुर स्वर लहरियों में गोते लगाने लगा. भक्ति की अद्भुत भाव भंगिमा में पगी इन पंक्तियों ने मानो सहज साक्षात माँ भवानी को सम्मुख उपस्थित कर दिया हो . विद्यापति की रचनाओं का भक्ति रस बरबस अपनी मीठास से मन प्रांतर के कण कण को आप्लावित कर देता है. बाद में मैंने उनसे विद्यापति के कुछेक दूसरे भजन भी बड़े चाव से सुने.
ये गीत अब भी मेरे कर्ण पटल को अपनी स्वाभाविक मधुरता और भक्ति भाव से झंकृत करते रहते हैं.
      इसीलिए, जब दरभंगा से सीतामढ़ी जाने के क्रम में मेरी दृष्टि सडक पर लगी पट्टिका पर पड़ी " विद्यापति जन्म स्थान 'बिसपी' 7 किलोमीटर " तो भला मै उस पुण्य भूमि को देखे बिना आगे न बढ़ जाने का लोभ कैसे न संवरण कर पाता ! तबतक गाडी थोड़ी आगे सरक चुकी थी. मैंने वाहन चालक को आग्रह किया कि वह गाड़ी को पीछे लौटाए और बिसपी गाँव की ओर मोड़ लें. चालक महोदय मिथिलांचल के ही थे . उनकी आँखों में मैंने एक अदृश्य गर्व भाव के दर्शन किये कि कोई व्यक्ति उनकी भूमि की महिमा को आत्मसात कर रहा है.
 रास्ते में एक डायवर्सन को पार कर हम प्रधानमंत्री सड़क निर्माण योजना के तहत एक नवजात वक्रांग सड़क पर रेंगते हुए करीब बीस मिनट की यात्रा कर भवानी के इस भक्त बेटे महाकवि बिद्यापति के अवतार स्थल पर पहुंचे. चाहरदिवारियों से घिरा एक अलसाया परिसर और उसके बड़े गेट पर लटका ताला ! गेट की दूसरी ओर परिसर के अन्दर विद्यापति की पाषाण मूर्ति साफ़ साफ़ दिख रही थी. हम बाहर से ही दर्शन कर अघाने की प्रक्रिया में थे. किन्तु भला ड्राईवर साहब कहाँ मानने वाले थे इस बात से कि वो बाहर से ही हुलका के हमें लौटा ले जाएँ ! वह मुझे झांकते छोड़ गाँव की ओर निकल गए और करीब दस मिनट बाद चाभी लिए एक अर्धनग्न कविनुमा व्यक्ति को लेकर पहुंचे, जिन्होंने बड़ी आत्मीयता से हमारा दृष्टि-सत्कार किया और गेट खोलकर हमें अन्दर ले गए. हमारे इस ग्रामीण गाइड ने  धाराप्रवाह अपनी मीठी बोली में हमें विद्यापति की कहानी सुनानी शुरू की. मेरे मानसपटल पर शनैः शनैः उनकी साहित्यिक आकृति उभरनी शुरू हो गयी.
     दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में विद्यापति से मेरा नाता बस अंक बटोरने तक रहा था. किन्तु, बाद में जब उनकी सृजन सुधा का पान करने का अवसर फुर्सत में मिला तब जाके लगा कि साहित्य की सतरंगी आभा क्या होती है. सरस्वती के इस बेटे ने विस्तार में बताया कि भक्ति, श्रृंगार और लोक जीवन आपस में किस कदर गूँथ जाते है और इस बात का तनिक आभास भी नहीं मिलता कि भावनाएं जब अपनी प्रगाढ़ता के अंतस्तल में मचलती हैं तो कब श्रृंगार-भावना भक्ति के परिधान में सज जाती हैं. उनकी रचनाएँ भावनाओं के विशुद्धतम फलक पर अवतरित होती हैं जो पांडित्यपूर्ण पाखण्ड और बौद्धिक छल से बिलकुल अछूती रहती हैं. राधा कृष्ण का श्रृंगार जब वे रचते है तो पुरी तन्मयता से वह स्वयं उसमे रच बस जाते हैं. जब वह राधा का चित्र खींचते हैं तो कृष्ण बन जाते है:
' देख देख राधा रूप अपार।
अपरूब के बिहि आनि मेराओल खित-तल लावनि सार॥
अंगहि अंग अनंग मुरछाएत हेरए पड़ए अथीर।
मनमथ कोटि-मथन करू जे जन से हेरि महि-मधि गीर॥"

चढ़ती उम्र की बालिकाओं में  शारीरिक सौष्ठव और सौंदर्य उन्नयन की भौतिक प्रक्रिया के साथसाथ उनकी बिंदास अल्हड़ता में नित नित  नवीन कलाओं के कंगना खनकते रहते हैं और तद्रूप मनोभाव  उनके श्रृंगारिक टटके नखड़े में नख शिख झलकते रहते हैं. कवि की दिव्य दृष्टि से राधारानी के ये लटके झटके अछूते नहीं रहते और उनकी अखंड सुन्दरता अपनी सारी सूक्ष्मताओं की समग्रता के साथ उनके सौन्दर्य वर्णन में समाहित हो जाते हैं, मानों ये वर्णन और कोई नहीं, स्वयं प्रियतम कान्हा ही अपनी प्रेयसी का कर रहे हों!
" खने-खने नयन कोन अनुसरई;खने-खने-बसन-घूलि तनु भरई॥
खने-खने दसन छुटा हास, खने-खने अधर आगे करु बास॥
.............................................................................................
बाला सैसव तारुन भेट, लखए न पारिअ जेठ कनेठ॥
विद्यापति कह सुन बर कान, तरुनिम सैसव चिन्हए न जान॥ "

विद्यापति की रचनाओं में राधा की सौन्दर्य सुधा का पान करते साक्षात् कृष्ण ही नज़र आते हैं.
सहजि आनन सुंदर रे, भऊंह सुरेखलि आंखि।
पंकज मधु पिबि मधुकर रे, उड़ए पसारल पांखि॥
ततहि धाओल दुहु लोचन रे, जेहि पथममे गेलि बर नारि।
आसा लुबुधल न तजए रे, कृपनक पाछु भिखारी॥ "

 और, जब विद्यापति  कृष्ण की छवि उकेरते हैं तो राधा की आँखे ले लेते हैं. अपने प्रिय के अलौकिक सौन्दर्य पर रिझती राधा कान्हा को अपने नयनों में बसाए घुमती रहती हैं:

  " ए सखि पेखलि एक अपरूप। सुनईत मानब सपन-सरूप॥
कमल जुगल पर चांदक माला। तापर उपजल तरुन तमाला॥
तापर बेढ़लि बीजुरि-लता। कालिंदी तट धिरें धिरें जाता॥
साखा-सिखर सुधाकर पांति। ताहि नब पल्लब अरुनिम कांति। "

राधा कृष्ण के सौन्दर्य वर्णन पर ही कवि का चित्रकार चित विराम नहीं लेता. एक दूसरे के अपूर्व प्रेम में छटपटाते प्रेमी युगल के साथ प्रकृति की सहभागिता में भी कवि ने मानवीय प्राण डाल दिए हैं. यहाँ मौसम की छटा प्रेम का वितान नहीं तानती, प्रत्युत गगन में गरजती घटा अपने विघ्नकारी रूप में उपस्थित होकर प्रिय से मिलने निकली प्रेयसी का रास्ता रोक लेती है और प्रिय दर्शन को आकुल व्याकुल आत्मा विरह व्यथा में चीत्कार कर उठती है:

"  सखि हे हमर दुखक नहि ओर
इ भर बादर माह भादर सुन मंदिर मोर॥
झांपि घन गरजति संतत, भुवन भरि बरंसतिया।
कन्त पाहुन काम दारुन, सघन खर सर हंतिया।
कुलिस कत सत पात, मुदित, मयूर नाचत मातिया।
मत्त दादुर डाक डाहुक, फाटि जायेत छातिया।
तिमिर दिग भरि घोरि यामिनि, अथिर बिजुरिक पांतिया।
विद्यापति कह कैसे गमाओब, हरि बिना दिन- रातिया॥"

फिर, जब मिलन की वेला आ जाती है तो प्रेयसी के सारे उपालंभ तिरोहित हो जाते हैं.  मन में इसी प्रकृति के प्रति उसके मन में अभिराम भाव अंकुरित हो उठते हैं:  
   "    हे हरि हे हरि सुनिअ स्र्वन भरि, अब न बिलासक बेरा।
गगन नखत छल से अबेकत भेल, कोकुल कुल कर फेरा॥
चकबा मोर सोर कए चुप भेल, उठिअ मलिन भेल चंद।
नगरक धेनु डगर कए संचर, कुमुदनि बस मकरंदा। "
मैंने विद्यापति का अवलोकन सर्वदा एक आम लोक गायक के रूप मे ही किया है . उनके गीतों या पदावलियों में एक आम आदमी का उछाह है. कहीं कोई कृत्रिमता या वैचारिक प्रपंच नहीं दिखता. सब कुछ सजीव , सब कुछ टटका . जैसा है वैसा है. बिकुल जीवंत. लगता है, कोई जीता जागता चित्र सामने से गुजर रहा है. मानवीकरण से ओत प्रोत. भगवान् शिव को एक गृहस्थ शिव के रूप में खडा कर दिया है उन्होंने जहां गृहिणी गौरा उपालंभ के तीर मारती हैं. अपने निकम्मे से पति को हल फाल लेकर खेती करने जाने को उकसाती हैं. घर में हाथ पर हाथ धर बैठने से कुछ होने वाला नहीं! खटंग को हल और त्रिशूल को फार बनाकर बसहा बैल लेकर खेती करने वे जाएँ अन्यथा उनकी निर्धनता और आलस्य लोगों के उपहास का विषय बन जायेगी. अब मै कोई साहित्य समीक्षक या सामजिक चिन्तक तो हूँ नहीं कि इन पंक्तियों में मैं वामपंथ की प्रगतिवादी जड़ खोज लूँ. किन्तु इतना अवश्य है कि अपने आराध्य भोले और गौरा के प्रकारांतर में कवि ने आम लोक जीवन में निर्धनता का दंश झेल रही एक गृहिणी के उसके नशेड़ी आलसी पति के प्रति व्यथित उद्गारों को वाणी प्रदान की है:

बेरि बेरि सिय, मों तोय बोलों
फिरसि करिय मन मोय
बिन संक रहह, भीख मांगिय पय
गुन गौरव दूर जाय
निर्धन जन बोलि सब उपहासए
नहीं आदर अनुकम्पा
तोहे सिव , आक-धतुर-फुल पाओल
हरि पाओल फुल चंदा
खटंग काटि हर हर जे बनाबिय
त्रिसुल तोड़ीय करू फार
बसहा धुरंधर हर लए जोतिए
पाटये सुरसरी धार.
यहाँ कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रकृति रूपिणी शक्ति अपने पुरुष में प्रेरणा के स्वर भर सृष्टि का सन्देश दे रहीं हो ! शक्ति के बिना शिव शव मात्र रह जाते हैं. कहीं इसीसे सृजन का बीज लेकर कामायनी में जयशंकर प्रसाद की ' श्रद्धा ' अपने मनु को यह सन्देश देते तो नहीं दिखती कि :
"कहा आगंतुक ने सस्नेह , अरे तुम हुए इतने अधीर
हार बैठे जीवन का दाँव , मारकर जीतते जिसको वीर."
 जो भी हो, इन लोक लुभावन लौकिक पंक्तियों में विद्यापति ने एक ओर भक्ति की सगुन सुरसरी की धारा बहायी है तो फिर उसमें उच्च कोटि के आध्यात्मिक दर्शन की चाशनी भी घोल दी है .
हमारे ग्रामीण गाइड महोदय हमें महत्वपूर्ण सूचनाएं दे रहे थे. अभी हाल में बिहार सरकार के सौजन्य से विद्यापति महोत्सव का आयोजन होने लगा है. उनके जन्म के काल के बारे में कोई निश्चित मत तो नहीं है लेकिन यह माना जाता है कि चौदहवीं शताब्दी के उतरार्ध में उनका जन्म हुआ था. कपिलेश्वर महादेव की आराधना के पश्चात श्री गणपति ठाकुर ने इस पुत्र रत्न को पाया था. उनकी माता का नाम हंसिनी देवी था. बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के स्वामी विद्यापति को अपने बालसखा और राजा शिव सिंह का अनुग्रह प्राप्त हुआ. उनके दो विवाह हुए . कालांतर में उनका परिवार बिसपी से विस्थापित होकर मधुबनी के सौराठ गाँव में बस गया. उनकी कविताओं में उनकी पुत्री ' दुल्लहि ' का विवरण मिलता है.
 हमारे सरस मार्गदर्शक बड़ी सदयता से हमें विद्यापति से जुडी किंवदंतियों की जानकारी दे रहे थे. साधारण धोती गमछा लपेटे ऊपर से साधारण दिखने वाले सज्जन की आतंरिक विद्वता अब धीरे धीरे प्रकाश में आने लगी थी. उन्होंने बताया कि विद्यापति शिव के अनन्य भक्त थे . उनकी भक्ति की डोर में बंधे शिव उनके दास बनने को आतुर हो उठे. वह 'उगना' नाम के सेवक के रूप में उनके यहाँ नौकरी मांगने आये. विद्यापति ने अपनी विपन्नता का हवाला देकर उन्हें रखने से मना कर दिया. उगना बने शिव कहाँ मानने वाले! उन्होंने उनकी पत्नी सुशीला की चिरौरी कर मना लिया और उनके नौकर बन उनकी सेवा करने लगे. एक दिन उगना अपने मालिक के साथ चिलचिलाती धुप में राजा के घर जा रहा था. रास्ते में मालिक को प्यास लगी. आसपास पानी नहीं था. उन्होंने उगना को पानी लाने को कहा. उगना पानी लाने गया. थोड़ी दूर जाकर उगना बने शिव ने अपनी जटा से गंगा जल निकाला और पात्र में लेकर मालिक को पीने के लिए दिया. माँ सुरसरी के अनन्य सेवक, भक्त और पुजारी बेटे विद्यापति को गंगाजल का स्वाद समझते देर न लगी. उन्हें दाल में कुछ काला नज़र आया और लगे जिद करने कि बता ये गंगा जल कहाँ से लाया! मालिक की जिद के आगे उगना की एक न चली . उसे अपने सही रूप में आकर रहस्योद्घाटन करना पड़ा, लेकिन एक शर्त पर कि मालिक भी यह भन्डा किसी के सामने नहीं फोड़ेगा , नहीं तो शिव अंतर्धान हो जायेंगे ! दिन अच्छे से कटने लगे . मालिक भक्त और सेवक भगवान !  एक दिन मालकिन सुशीला ने उगना को कुछ काम दिया. ठीक से नहीं समझ पाने से वो काम उगना से बिगड़ गया . फिर क्या! मालकिन भी बिगड़ गयी और 'खोरनाठी' (आग से जलती लकड़ी) से उगना की पिटाई शुरू हो गयी. विद्यापति ने ये नज़ारा देखा तो रो पड़े. उनके मुंह से बरबस निकल पड़ा " अरे ये क्या कर डाला? ये तो साक्षात शिव हैं!" बस इतना होना था कि शिव अंतर्धान हो गए. उगना के जाते ही विद्यापति विक्षिप्त हो गए और महादेव के विरह में पागलों की तरह विलाप करने लगे. निश्छल भक्त की यह दुर्दशा देखकर महादेव की आँखों में आंसू आ गए. वह फिर प्रकट हुए और भक्त से बोले " मैं तुम्हारे साथ तो अब नहीं रह सकता लेकिन प्रतीक चिन्ह में लिंग स्वरुप में तुम्हारे पास स्थापित हो जाउंगा. मधुबनी जिले के भगवानपुर में अभी भी उगना महादेव अपने भक्त शिष्य को दिए गए वचन का निर्वाह कर रहे हैं.
हमें इस कहानी को सुनाने के बाद ग्रामीण महोदय ने एक लोटा मीठा जल पिलाया जिसे हमने मन ही मन उगना का गंगाजल ही माना. फिर उन्होंने विद्यापति के माँ गंगा से अनन्य प्रेम और उत्कट भक्ति की अमर कथा सुनायी. काफी वय के हो जाने के बाद विद्यापति ठाकुर (मिथिला के इस कोकिल कवि का पूरा नाम) रुग्ण हो चले थे  और अपना अंतिम समय अपनी परम मोक्षदायिनी माँ भागीरथी के सानिद्ध्य में बिताना चाहते थे . इसे यहाँ गंगा सेवना कहते हैं. कहारों ने विद्यापति की पालकी उठायी और सिमरिया घाट की ओर चले. पीछे पीछे पूरा परिवार. रात भर चलते रहे. भोर की वेला आयी. अधीर विद्यापति ने पूछा "कितनी दूर और है"? कहारों ने बताया "पौने दो कोस". पुत्र विद्यापति अड़ गया. "पालकी यहीं रख दो. जब पुत्र इतनी लम्बी दुरी तय कर सकता है तो माँ इतनी दूर भी नहीं आ सकती." पुत्र की आँखों से अविरल आंसू बह रह थे . माँ भी अपनी ममता को आँचल में कब तक बांधे रह सकती थी. हहराती हुई पहुँच गयी अपने लाल को अपने आगोश में लेने ! अधीर पुत्र ने अपनी पुत्री दुल्लहि से कहा:
दुल्लहि तोर कतय छठी माय
कहुंन ओ आबथु एखन नहाय
वृथा बुझथु संसार-बिलास
पल पल भौतिक नाना त्रास
माए-बाप जजों सद्गति पाब
सन्नति काँ अनुपम सुख पाब
विद्यापतिक आयु अवसान
कार्तिक धबल त्रयोदसी जान.
पुत्र विद्यापति को उसके जीवन का सर्वस्व मिल चुका था. उसका पार्थीव शरीर अपनी माँ की गोद में समा चुका था. उसके अंतस्थल से माता के चरणों में श्रद्धा शब्दों का तरल प्रवाह फुट रहा था:
बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे
छोड़इत निकट नयन बह नीरे
करजोरी बिलमओ बिमल तरंगे
पुनि दरसन होए पुनमति गंगे
एक अपराध छेमब मोर जानी
परसल माय पाय तुअ पानी
कि करब जप ताप जोग धेआने
जनम कृतारथ एकही सनाने 
माँ गंगा अपने बेटे को गोदी में लिए बहे जा रही थी. नयनों में स्मृति नीर लिए हम वापस अपने गंतव्य को चले जा रहे थे............." उगना के मालिक विद्यापति अपनी अंतिम गति को प्राप्त कर रहे थे!" 

Saturday, 1 July 2017

बरसाती आवारा !

अगिन विरह की पवन जो बोता,
दुबकी दुपहरी सूख गया सोता।

जले खेत हो मिट्टी राखी,
मुरझाये हो मन के पाखी।


तड़पे वनस् पति और पक्षी,
प्रेम पाती को तरसी यक्षी।

दिवस उजास और रातें काली,
आकुल व्याकुल वसुधा व्याली। 


प्यासी नदियाँ, सूखे कुएँ
चील चिचियाती, उठते धुएँ
धनके सनके, सूरज पागल,
अब भी भला, न बरसे बादल!


सूरज तपता धरती जलती
कण कण माटी का रोया।
बादल मैं! आंसू से मैंने
धरती का आँचल धोया।


रिस रिस कर मैं रसा रसातल
रेश रेश रस भर जाता हूँ।
यौवन जल छलकाकर के
सरित सुहागन कर जाता हूँ।


उच्छ्वास मैं घनश्याम का,
चेतन की धारा अविरल ।
प्राण पीयूष पा आप्लावन,
चित पुलकित प्रकृति पल पल।


प्राणतत्व मै, मनस तत्व मै
जीव संजीवन धारा हूँ,
विकल वात वारिद बादल बस !

बरसाती आवारा हूँ !