Saturday, 10 December 2016

जय नोटबंदी!


--------------------
भीड़ भाड़, कशमकश!
धक्कामुक्की, ठेलाठेली।
जिनगी की लाइन मे खड़ा मैंं
नए 'अर्थ' ढूंढते संगी सहेली !

जिनगी जीता , पंक्तिबद्ध!
खुद को आड़े तिरछे हारकर।
मीठे भरम में जीता ज़िन्दगी ,
गिरवी रखकर  दिहाड़ी पर।

लाइन संसरती, कछुए सी, लेकर
मेरा सफ़ेद श्रम, उसका काला धन।
करते कौड़ी कौड़ी स्याम श्वेत
मेरे मेहनत कश स्वेद कण।

दुखता, बथता, टटाता
प्रताड़ित पैर,पीड़ित पोर पोर!
पुराने नोट, ढलती काली शाम
उगती दुहज़ारी गुलाबी नरम भोर!

नयी परिभाषाएं रचता
वैशाली का लिच्छवी गणतंत्र।
नकली-काला-आतंकी!धन तंगी.
कौटिल्य कुटिल अर्थ मौर्य मन्त्र।

कैशलेस , डिजिटल समाज,
मंदी.....फिर ... आर्थिक बुलंदी।
जन धन आधार माइक्रो एटीएम
आर्थिक नाकेबंदी! जय नोटबंदी!!

Saturday, 19 November 2016

" गली में दंगे हो सकते हैं "

" गली में दंगे हो सकते हैं " भारत के न्याय निकाय के मुखिया का यह वक्तव्य न्याय के मूल दर्शन (जुरिस्प्रुदेंस) के अनुकुल नहीं प्रतीत होता है. एक गतिशील और स्वस्थ लोकतंत्र में संस्थाओं को अपनी मर्यादाओं के अन्तर्गत अपने दायित्व का निर्वाह करना अपेक्षित होता है.न्याय तंत्र संभावनाओं पर अपना निर्णय नहीं सुनाता. 'हेतुहेतुमदभुत' का न्याय दर्शन में निषेध है.
'दंगाइयों को यह आभास दिलाना की यह अवसर उनकी क्षमता के अनुकूल है' कहीं से भी और किसी भी प्रकार एक स्वस्थ, सुसंकृत एवं सभ्य समाज में किसी भी व्यक्ति को शोभा नहीं देता . ऐसी गैर जिम्मेदार बातों से वह व्यक्ति जाने अनजाने स्वयं उस संस्था की अवमानना कर बैठता है जिसकी गरिमा की रक्षा करना उसका प्रथम, अंतिम एवं पवित्रतम कर्तव्य होता है.
समाज में कार्यपालिका को उसकी त्रुटियों का बोध कराना, उसके कुकृत्यों को अपनी कड़ी फटकार सुनाना, असंवैधानिक कारनामों को रद्द करना और प्रसिद्द समाज शास्त्री मौन्टेस्क्यु के 'शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत ' के आलोक में अपनी स्वतंत्र सत्ता को कायम रखना एक संविधान चालित लोकतंत्र में न्यायपालिका का पवित्र एकाधिकार है.भारत की न्यायपालिका का चरित्र इस मामले में कुछेक प्रसंगो को छोड़कर त्रुटिहीन, अनुकरणीय एवं अन्य देशों के लिए इर्ष्य है.यहीं कारण है कि भारत की जनता की उसमे अपार आस्था और अमिट विश्वास है और यहीं आस्था और विश्वास न्याय शास्त्र में वर्णित न्यायशास्त्री केल्सन का वह 'ग्रंड्नौर्म' है जिससे भारत की न्यायपालिका अपनी शक्ति ग्रहण करती है.
संस्थाओं का निर्माण मूल्यों पर होता है और उन मूल्यों के संवर्धन, संरक्षण और अनुरक्षण उन्हें ही करना होता है. अतः इन संस्थाओं को लोकतंत्र में सजीव और स्वस्थ बनाए रखना सबकी जिम्मेदारी है. ऐसे में व्यक्तिगत तौर पर मैं भारत के वर्त्तमान महामहिम राष्ट्रपतिजी के आचरण से काफी प्रभावित हूँ.
आशा है मैंने संविधान प्रदत्त अपने विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अतिक्रमण नही किया है, यदि भूल वश कही चुक गया होऊं तो क्षमा प्रार्थी.

Friday, 11 November 2016

बाह! नाज़िर!!

थी अर्थनीति जब भरमाई,
ली कौटिल्य ने अंगड़ाई ।

पञ्च शतक सह सहस्त्र एक
अब रहे खेत, लकुटिया टेक।

जहां राजनीति का कीड़ा है,
बस वहीं भयंकर पीड़ा है ।

जनता  खुश,खड़ी कतारों में,
मायूसी मरघट सी, मक्कारो में ।

वो काले बाजार के चीते थे
काले धन में दंभी जीते थे।

धन कुबेर छल बलबूते वे,
भर लब लबना लहू पीते थे।

मची हाहाकर उन महलो में,
लग गए दहले उन नहलों पे।

हैं तिलमिलाए वो चोटों से,
जल अगन मगन है नोटों से।

भारत भाल भारतेंदु भाई,
दुरजन  देखि हाल न जाइ।

जय भारत, जय भाग्य विधाता,
जनगण मनधन खुल गया खाता।

तुग़लक़! कोई बोले शाह नादिर,
भारत बोले बस ' वाह नाज़ीर '!

बाह नाज़िर! बाह बाह नाज़ीर !!










Friday, 4 November 2016

बन्दे दिवाकर,सिरजे संसार

अनहद ‘नाद’
ॐकार, टंकार,
‘बिंदु’-विस्फोट,
विशाल विस्फार।

स्मित उषा
प्रचंड मार्तण्ड,
पीयूष प्रत्युषा,
प्रसव ब्रह्माण्ड।

आकाशगंगा
मन्दाकिनी,
ग्रह-उपग्रह
तारक-चंद्रयामिनी।

सत्व-रजस-तमस
महत मानस व्यापार,
त्रिगुणी अहंकार,
अनंत अपार।

ज्ञान-कर्म-इंद्रिय
पंच-भूत-मात्रा सार,
अपरा-परा
चैतन्य पारावार।

निस्सीम गगन
प्रकम्पित पवन,
दहकी अगिन
क्षिति जलमगन।

अहर्निशं
अज अविनाश,
शाश्वत, सनातन
सृजन इतिहास।

जीव जगत
भेद अथाह,
अविरल अनवरत
काल प्रवाह।

वेद पुराण
व्यास कथाकार,
बन्दे दिवाकर
सिरजे संसार।

Thursday, 13 October 2016

एकोअहं,द्वितीयोनास्ति

   
       (१)
ऊँघता आसमान,
टुकुर टुकुर ताकता चाँद।
तनहा मन,मौन पवन।
सहमे पत्ते,सोयी रात।
सुबकता दिल।
आँखे,उदास झील।
उस पर पसरती
अवसाद की
स्याह परत।
और!
एकांत को तलाशता
मेरा अकेला
अकेलापन।

       (२)
आया अकेला,
चला अकेला,
चल भी रहा हूँ
अकेला,और अब
जाने की भी तैयारी!
अकेले।
पर न कभी एकांत हुआ,
न तुम मिले।
न जाने,
कितनी ज़िन्दगियाँ
पार करके,
ढूंढता एकांत
पहुँचा हूँ यहाँ।


        (३)
पथ अनवरत है ये!
मिलूंगा,जब कभी तुमसे।
तो, एकांत में ही!
तसल्ली से लिखूंगा
तभी, मुक्ति का गीत।
पूरी होगी साध
तब जा के,
मिलने की तुमसे,
 मेरे मीत।
धुल जाती,धूल स्मृति की।
सरकने में बार बार,
भ्रूण के एक कोख से
दूसरे गर्भ के बीच।


           (४)
आह्लादित,मर्माहत
माया की कुटिया में
ज़िन्दगी की कथा
बांचते बाँचते,
फिर! सो जाता हूँ।
अकेले।
भटकने को
योनि दर योनि,
अकेले।
एकांत की तलाश में।
आज
ज़मीन पर लेटा,
आसमान को निहारता।


         (५)
टिमटिमाते तारों में,
अकेलेपन को उकेरता।
उदासियों की आकाशगंगा
सुगबुगाया फिर ,
मेरा अकेलापन।
और, मचल उठा है
मन।
पाने को एकांत!
नींद के जाते ही
हो गयी हैं अकेली
आँखे।
परंतु, मन की मन्नत है,
नितांत एकांत!


       (६)
मन को एकांत आते ही
बन जायेगी मेरी आत्मा
परमात्मा!
पंचमात्रिक इंद्रियों
से भारित पंचभूत,
होगा मुक्त।
योनियों के झंझट से।
फिर, हम दोनों
होंगे एक ,
और गूंजे ब्रह्माण्ड
समवेत प्रशस्ति
एकोअहं
द्वितीयोनास्ति!

Tuesday, 11 October 2016

अघाये परमात्मा!

मैं सजीव
तुम निर्जीव!
तुम्हारे चैतन्य के
जितना करीब आया।
अपने को
उतना ही
जड़ पाया।
स्थावर शव,
जंगम शक्ति।
यायावर शिव बनाया!


मन खेले, तन से,
और अघाये आत्मा।
ज्यों
खिलौनों से खेले शिशु,
और हर्षाये
पिता माँ।
बदलते खिलौने,
बढ़ता बालक,
पुलकित पालक।
यंत्रवत जगत!


क्षणभंगुर जीव
 समजीवी संसार
सम्मोहक काल
सबका पालनहार।
दृश्य, द्रष्टा दृश्यमान,
रथ,रथी, सारथी ,
सर्वशक्तिमान!
स्वर, व्यंजन ,
हृस्व, दीर्घ,प्लुत।
सबसे परे ........अद्भुत!

कौन सजीव,
कौन निर्जीव?
किसकी देह,
किसका जीव?
कौन करता
कौन कृत।
किसका करम,
किसके निमित्त।
भरम जाल
उलझा गया काल!


जीव  जकड़े देह,
भरमाये जगत
जड़-चेतन,आगत विगत।
 विदा स्वागत, त्याजे साजे
रासलीला,  पूर्ववत।
आवर्त, अनवरत,सरल- वक्र
आलम्ब, आघूर्ण, काल चक्र!
खेल गज़ब रब का
जनम करम खातमा।
अघाये परमात्मा!

Saturday, 1 October 2016

गांधी और चंपारण

चंपारण की पवित्र भूमि मोहनदास करमचंद गांधी की कर्म भूमि साबित हुई।दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह विदेशी धरती पर अपमान की पीड़ा और तात्कालिक परिस्थितियों से स्वत:स्फूर्त लाचार गांधी के व्यक्तित्व की आतंरिक बनावट के प्रतिकार के रूप में पनपा, जहां रूह की ताकत ने अपनी औकात को आँका। लेकिन एक सुनियोजित राष्ट्रीय जागृति के औज़ार के रूप में इसका माकूल इज़ाद चंपारण की जमीन पर ही हुआ। वहां गांधी स्वेच्छा से नहीं गए थे, ले जाये गए थे।
सच कहें तो उस समय तक का गांधी का अधिकांश समय भारत से बाहर  बीता  था। गांधी जब भारत पहुंचे तो कांग्रेस परिवर्तन के दौर से गुजर रही थी।  1907 में सूरत में नरम गरम अलग हो चुके थे। बिपिन चंद्र पाल और सुरेंद्र नाथ बनर्जी बूढ़े हो चले थे। महर्षि अरबिन्द राजनीति छोड़ आध्यात्म की अमराई में आत्मा का अनुसन्धान कर रहे थे।लाला लाजपत राय अमेरिका चले गए थे। फ़िरोज़ शाह मेहता और गोखले परलोक सिधार चुके थे। तिलक के कांग्रेस में पुनः राजतिलक की तैयारी चल रही थी। 1915 के बंबई अधिवेशन में कांग्रेस के संविधान में अनुकूल संशोधन कर दिया गया था। गरम दल के नेता फिर से छाने लगे थे। व्यावहारिक राजनीति का बोलबाला बढ़ने लगा था। तिलक का विचार था कि राजनीति में सत्य का कोई स्थान नहीं है। यह सांसारिक लोगो की क्रीड़ा है, न कि साधुओं की।
ठीक इसके उलट, गांधी नैतिक बल के प्रखर प्रवक्ता थे। वह हिन्दू धर्म के सांस्कारिक पालने में पले बढ़े थे। बौद्ध दर्शन से आंदोलित थे। और फिर, पश्चिम के विचारक टॉल्सटॉय, थोरो, रस्किन और इमरसन के विचारों से खासे प्रभावित थे। उनके विचारों में राज्य की ताकत उसके नैतिक पक्ष से निकलती है जो सही मायने में जनता की ताकत होती है। गांधी नैतिकता और आध्यात्मिक शक्ति की नींव पर राज्य का निर्माण चाहते थे। इसी कारण वह तब के कांग्रेस नेताओं को रास नहीं आते थे। 1915 के बेलगांव में बॉम्बे कांग्रेस की बैठक में भारी विरोध के बीच उन्हें शरीक होने का निमंत्रण मिला था।
इसलिए ऐसी स्थिति में यदि 1916 में कांग्रेस के नेताओं ने चंपारण की व्यथा बयान करने वाले राजकुमार शुक्ल को गांधी के पास जाने को कह दिया तो इससे कांग्रेस की चंपारण के प्रति गंभीरता का अभाव ही झलकता है। और चंपारण की माटी में 'महात्मा' बनने वाले गांधी ने भी अपने चंपारण यज्ञ को अध्यात्म, सत्य, अहिंसा और नैतिकता की वेदी पर ही संपन्न किया जो कांग्रेस की राजनितिक सहभागिता और दर्शन से कोसों दूर था।
सच कहें तो, राजकुमार शुक्ल से रु ब रु होने से पहले तक गांधी को भारत के मानचित्र पर चंपारण की भौगोलिक स्थिति के ज्ञान की बात तो दूर, उन्होंने चंपारण का नाम तक नहीं सुना था। 1916 में लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में जब शुक्लजी ने चंपारण के किसानों का दुखड़ा रोया तो वह भीड़ में खड़े एक आम याचक से ज्यादा कुछ नहीं दिख पाये।इसे नक्कारखाने में तूती की आवाज के मानिक बिलकुल खारिज़ तो नहीं किया गया किन्तु बड़े नेताओं के कान पर जू की इतनी सुगबुगाहट जरूर हुई कि गांधी से मिलने की सलाह देकर बात आई गयी हो गयी। गांधी तब एक नवागत से ज्यादा कुछ नहीं थे जो परदेश में अपने अहिंसा के अमल की शोहरत लिए घूम रहे थे।
निराश राजकुमार शुक्ल। मरता क्या न करता! चंपारण की तीन कठिया चक्की में पिसते किसानों की दुर्दशा उन्हें दिन रात दूह रही थी।जबरन नील की उगाही। जमीन की कमरतोड़ मालगुज़ारी। दर्जनों टैक्स की मार। किसिम किसिम के नज़राने निलहे साहब की कोठी पर पहुचाने होते। समय पर नहीं चुकाने पर भीषण अत्याचार। पेड़ो से बांध कर पिटाई।खेतो पर कब्ज़ा। कर्ज में झुकी कमर और उस पर डंडे का कहर। मुझे लगता है कि लाचारी औए बेबसी की व्यथा से विगलित दिल का विक्षोभ और विद्रोह संघटित होकर अपने रचनात्मक तेवर में गांधी के अंदर अहिंसा और सत्याग्रह के दर्शन का जो शक्ल ले चुका था, राजकुमार शुक्ल की आत्मा उस आहट से आंदोलित होने को बेचैन हो रही थी।
' कर या मरो' के भाव में वह गांधी के पास पहुँचे। शुरू के क्षणों में तो गांधी से भी उन्हें फीकी प्रतिक्रिया ही मिली। लेकिन चंपारण का यह फ़क़ीर भी कहाँ दम लेने वाला था। ध्रुव की जन्मभूमि चंपारण का यह दीन राजकुमार ध्रुव प्रतिज्ञा ठान के आया था कि चंपारण की चीत्कार वह देश के जन जन को सुना के ही दम लेगा। वह छाया की भांति गांधी का पीछा करने लगा। पहले लखनऊ। फिर गणेश शंकर विद्यार्थी के पास कानपुर। फिर कलकत्ता।और अंत में खींच लाया गांधी को पटना।
पटना में राजकुमार शुक्ल ने गांधी को राजेंद्र बाबु के घर टिकाया। वहाँ गांधी को अपनी आशा के प्रतिकूल आवाभगत जरूर खटकी। एक तो गांधी को राजेंद्र बाबु के तीमारदार जानते नहीं थे , दूसरे राजकुमार शुक्ल की साधारण हैसियत।लेकिन असाधारण घटना तो घट चुकी थी! इतिहास करवट ले चुका था। शुक्लजी के 'महात्माजी' मजहरुल हक़ के रिहायश पर ठहरे। मुजफ्फरपुर आये। फिर तो आगे जो हुआ वह आज़ाद हिंदुस्तान के तवारीख का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव बना।
शुक्लजी के द्वारा संबोधित शब्द 'महात्माजी' ने अपनी महिमा के ऐसे निस्सीम व्योम का भव्य विस्तार किया जिसमें 'मोहनदास करमचंद' लुप्त हो गया और एक ऐसे धूमकेतु का प्रादुर्भाव हुआ जिसकी रोशनी से पूरी दुनिया चकाचौंध हो गयी। यह चमचमाता धूमकेतु था-' महात्मा गांधी'। चंपारण सदृश विशाल पीपल की छाया में पहुंचे बोधिसत्व गांधी सामाजिक और राजनीतिक दर्शन के एक नए आयाम का ज्ञान दर्शन करा रहे थे और उनके हाथ में जिम्मेदारियों से भरा खीर का थाल थाम रहे थे राजकुमार शुक्ल, सतवरिया के सुरमा!
सतवरिया के शुक्लजी की आँखों में अंग्रेजी हुकूमत की वो तमाम बेरहमी और पाश्विकता नाच रही थी।
नील के खेतीहर किसान साठी में विद्रोह कर बैठे थे।ब्रितानी सरकार का दमन अपने पूरे शबाब पर था।साम, दान, दंड , भेद,लाठी, गोली, कोड़ा, जाति, धरम सब कुछ झोंक दिया बर्बर निलहे साहब ने किसानों को कुचलने के लिए।ऊँची जाति के लोगो को डोम और धांगड़ जाति के लोगो से पिटवाया।
लकड़ी से लदी बैलगाड़ी खिंचवाई। पेट में हाथ बांधकर लाल चींटों से कटवाया।19 आंदोलनकारियों को सजा सुनाई। दिसंबर 1908 आते आते 200 से अधिक किसान जेल में ठूंस दिए गये। दमन का दानव डकारे लेता रहा। 1914 में पिपरा में अंग्रेजो ने फिर नील के खेतिहरों पर अपने अत्याचार का कहर बरपाया। जन मानस आजिज़ हो उठा। 10 अप्रैल 1914 को कांग्रेस ने अपनी बिहार प्रांतीय समिति में चर्चा की। लेकिन कांग्रेस की यह चर्चा बेअसर रही। 1916 में पानी सर से ऊपर इतना बहा कि तुरकौलिया के भूमि पुत्र सर पर कफ़न बांध इंक़लाब को कूच कर गए।चंपारण का व्याकुल राजकुमार लखनऊ के मंच पर चंपारण की चीत्कार सुना आया। लेकिन कांग्रेस इस विषय को इतना धारदार नहीं बना पाई जितना  साधारण सी वेश भूषा में अपने सहज सीधेपन को लपेटे चंपारण के इस फकीर ने अपनी फौलादी इच्छा शक्ति और अदम्य धैर्य के बल बूते गांधी के पीछे छाया की तरह लगे रहकर राष्ट्रीय वितान पर उभारकर रख दिया।
10 अप्रैल 1917 को गांधी चंपारण पहुँचे। घर घर जाना, किसानों से मिलना, उनका सूरते हाल जानना, विस्तार से सभी समस्यायों का सांगोपांग सर्वेक्षण करना, बदनसीब और बदहाल खेतिहरों के आंसुओं में बहते धुलते सपनो को पढ़ना, उनके बयानों को दर्ज करना--- एक ऐसी क्रांतिकारी पहल आकार लेने लगी कि मानो चंपारण की धरती के डोलने के संकेत मिलने शुरू हो गए हों। झुलसती गर्मी में धनकती धरती पर मृतप्राय लेटी झुरझुराई मरियल वनस्पति बारिश की पहली फुहार पड़ते ही धरती की सोंधी महक के साथ हरिहराकर तन जाती हैं, ठीक वैसे ही चंपारण का जन सैलाब अब तन कर खड़ा हो गया था। एक नयी ऊर्जा हिलोरे ले रही थी। भीम और अर्जुन युधिष्ठिर में  समा गए थे।
गांधी के आकर्षण पाश में चंपारण समाता चला जा रहा था।आंदोलन की आत्मा सामाजिक और सांस्कृतिक कलेवरों से सजने लगी। गांवों में सफाई होने लगी। बुनियादी विद्यालय खुलने लगे।अस्पताल की व्यवस्था होने लगी।  स्त्रियाँ परदे तोड़कर बाहर आने लगी।छुआछूत का विरोध होने लगा।नशे का बहिष्कार होने लगा। समाज में सर्वांगीण परिवर्तन की लौ धधक उठी। दिग दिगंत ' बापूजी की जय', 'एक चवन्नी चानी की, जय बोल महातमा गान्ही की', जैसे नारों से गूंज उठा। सही मायने में राष्ट्रीय जागरण की सामाजिक पटकथा राजनीतिक फलक पर पहली बार लिखी गयी। अहिंसा और सत्याग्रह के इस सर्वथा अर्वाचीन 'सविनय- अवज्ञा' दर्शन ने अँगरेज़ी आँखों को चकाचौंध कर दिया। चंपारण चमत्कार की चपेट में आने लगा। सरकार की चूलें हिलती लगने लगी।
चंपारण के कलेक्टर ने गांधी को जिला बदर का हुक्म सुनाया। गांधी ने नाफरमानी की घोषणा कर दी। तिरहुत के कमिश्नर ने गिरफ़्तारी का वारंट तामील कर दिया। गांधी ने शंख नाद कर दिया। गांधी ने अदालत में उद्घोष किया " मैं अपने ऊपर जारी किये गए सरकारी आदेश को मानने से इंकार करता हूँ, इसलिए  नहीं कि इस वैधानिक सत्ता के प्रति मेरे दिल में सम्मान की कोई कमी है बल्कि इसलिए कि इससे भी ऊँची अंतरात्मा की एक पवित्र सत्ता है जिसका हम अनुपालन करते हैं।"  गांधी के कानून तोड़ते ही चंपारण का उत्साह सातवे आसमान में चला गया।जन भावनाएं उछाह लेने लगी। ऐसा लगा मानो सदियो पुरानी गुलामी की बेड़ियाँ टूट गयी हो। लेफ्टिनेंट गवर्नर का आदेश आया कि गांधी को अविलंब रिहा कर दिया जाय। गांधी रिहा हो गए और फिर क्या हुआ, आज हम सब जानते है। चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर गया है। आज इस अवसर पर, हम उनकी बातों को याद करते हैं- " चंपारण के दिन मेरी जिंदगी के कभी नहीं भुलाये जाने वाले दिन है। यह मेरे और चंपारण के किसानों के वे सुनहले दिन हैं जब मुझे उन किसानों में सत्य, अहिंसा और ईश्वर के दर्शन हुए।"

Tuesday, 6 September 2016

कथा सभ्यता की.

मानव सभ्यता की कथा उस पांडुलिपि के समान है जिसके शुरुआती पन्ने खो गये हैं. सभी धर्मों के दर्शन ने उन खोये पन्नों को अपने अपने ढ़ंग से सहेजने का प्रयास किया है. कौन थे पहले मानव युगल. कहाँ से सृष्टि ने अपना आगाज़ किया.जल थल या नभ! हिन्दु धर्म में दशावतारों की अवधारणा ने भी बड़े रोचक ढ़ंग से सृष्टि के उद्भव और क्रमिक विकास को रेखांकित किया है. मीन अवतार जल में सृजन के प्रथम चरण की ओर इंगित करता है. कुर्मावतार जीव के जल से थल की ओर यात्रा के चरण की ओर संकेत करता है. वाराह अवतार जीव के धरती पर स्थापित होने का काल है. नृसिन्ह अवतार जीव के मानव सा आकार ग्रहण करने का विकास क्रम है. इस काल में सभ्यता अपने आदिम पाश्विक स्वरुप में ही विद्यमान रही. नख हमले के औज़ार के रुप में प्रयोग होता था.
नख से धत्विक हथियारों में संक्रमण का काल परशुराम अवतार का समय है जहां पाश्विक क्रोध भंगिमा और हाथों मे लोहे का परशु धारण किये परशुराम एक महत्वपूर्ण काल सेतु पर खड़े दिखते हैं. अंग के रुप में प्रायोगिक रुप से  हाथों के उद्भव का काल है यह. परशु का कुशल प्रयोग करने में परशुराम की हाथें सिद्धहस्त हैं.
राम अवतार सृष्टि क्रम का वह महत्वपूर्ण पड़ाव प्रतीत होता है जहां मानव स्वरुप में विकास के साथ साथ मानवीय मूल्य आकार लेना शुरु करते हैं. मनुष्य प्रजाति का अधिकांश अभी जंगलों में ही रहता है आदिवासी रुप में. किंतु मानवीय संस्थायें अपने उद्भव की यात्रा यहीं से शुरु करती प्रतीत होती हैं.        
इंसानियत, मानवीय मूल्य और मनुष्य जीवन की मर्यादायों को परिभाषित करने और उनकी स्थापना का यह काल है. आसुरी वृत्तियों को पराजित कर सदाचार की मान्यतायें अपनी विजय पताका लहराती हैं. इस यज्ञ मे मनुष्य के साथ चौपाये भी कदम से कदम मिलाकर चलते प्रतीत होते हैं मानों मनुष्य ही नहीं बल्कि समस्त जीव जगत के लिये सामाजिक जीवन का विधान रचा जा रहा हो. जीवन का अधिकांश यहाँ भी नदियों के किनारे, जंगलों, पहाड़ों, कन्दराओं और गुफाओं में ही मिलता है. नगर और नागरिक व्यवस्था का उद्गम संगठित रुप लेता यहाँ से दिखायी देता है.
कृष्ण अवतार तक आते आते मानव सभ्यता अपने उन्नयन बिन्दु का स्पर्श कर लेती है. इस काल के मानवीय व्यवहार का गहरायी से अवलोकन करे तो हम पाते हैं कि तब से अब तक इसके मौलिक तत्व में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं हुआ है.
बुद्ध अवतार वैचारिक और तत्व मीमांसा के स्तर पर मानव विकास यात्रा का चरम बिन्दु है.  
यह तो हुई विकास क्रम की एक सरल रेखा. अब प्रश्न उठता है कि कौन थे पहले मानव युग्म! या, अलग अलग जगहों पर और काल क्रम के कमोवेश थोड़े अंतर पर मानवीय शक्ल में अलग अलग स्तर के प्राणी युगलों ने सृष्टि के क्रमिक विकास-यज्ञ का स्वतंत्र उन्मेष किया. प्रजनन के स्तर पर प्रारभ में जंतुओं में कोई भेद न रहा हो. बाद में समय के प्रवाह में जैविक विकास के साथ साथ व्यावहारिक स्तर पर भी सुधार और विकास का क्रमिक विकास जारी रहा और विकास की यह प्रक्रिया कमोवेश मर्यादा स्थापना काल में अपने पूर्ण आकार में आ गयी.
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात कि सृजन क्रिया नारी के बिना तो असम्भव है. फिर, मानव रूप में आदि नारी का आगमन तो तय है. तो, मानव रुप में पुरुष पक्ष का प्रतिनिधित्व पहले पहल कब हुआ, यह भी उन खोयी पाण्डुलिपियों के गर्भ में ही छुपा हुआ है.यह भी सुनिश्चित है कि प्रथम गर्भ को उस आदि माता ने ढोया होगा और प्रथम प्रसव वेदना का भोग भी उसी के हिस्से आया होगा. माँ की ममता का पहला सोता भी तभी फूटा होगा. उसका पुरुष सहचर सिवा मूक दर्शक बने अपने कोतुहल को अपने हाव भाव में समेटे बैठने के और भला कर ही क्या पाया होगा. कुल मिलाकर कुछ इसी तरह सृजन की पहली लीला उसके सामने से गुजरी होगी.
संभवतः पहली बार उस हिंसक आदिम द्विपादी जीव ने उस शिशु काया को गोद में लेकर उसकी कोमल मुखाकृति में अपनी प्रतिछवि देखी होगी तथा स्पर्श सुख में धड़कने वाली अपनी छाती की धुकधुकी के मानवीय सुर सुने होंगे. नवजात शिशु को चुमते ही वात्सल्य की पहली लता पनपी होगी. अपनापन के भाव आये होंगे. शिशु के मुस्कान में माता और पिता साथ साथ नहाए होंगे और साहचर्य तथा संवेदना का स्वाद चखा होगा. दाम्पत्य की दामिनी चमकी होगी. दो जोड़ी आँखे पहली बार जिम्मेदारी के अह्सास से मिली होंगी. नीरव वन प्रांतर में पहली बार बाल किलकारी गूँजी होगी. पशु, पक्षी, जंतु, वनस्पति एक अद्भुत खुशी के अह्सास में झुमे होंगे. माता ने अपने हर क्षण नवजात की सेवा में निछावर किये होंगे और पिता इशारे मात्र पर आवश्यक सामग्री जुटाने को दौड़ पड़ता होगा.
मानवीय संस्कृति और आचरण की सभ्यता की पहली किरण तभी फूटी होगी. आगे की हर घड़ी सभ्यता के इतिहास का रचनात्मक क्षण रहा होगा. सुख, दुख, प्रेम, मिलन, विरह, प्रणय-भाव, करुणा, ममता, मोह,  वात्सल्य, दया, क्षमा और वे तमाम श्रृंगारिक चेष्टायें जो मनुष्य को अन्य प्राणियों से विलग करती हैं अंकुरित हुए होंगे. चेहरे पर हाव भाव एवं हास परिहास की भाव मुद्राओं ने तभी अपनी लय पकड़ी होगी. माँ और शिशु के भावनाओं के आलाप की भाषा ने अपना स्वरुप गढना शुरु किया होगा. सबसे पहली भाषा का जन्म ध्वन्यात्मक रुप में माँ औए शिशु के पारस्परिक संवाद में ही हुआ होगा. किसी खास लय में ध्वनि, इशारा और इंगित वस्तु के संयोग से भाषा का उद्भव हुआ होगा. यहीं से मानव सभ्यता को पर लगे, संस्कृति की संरचना का श्री गणेष हुआ होगा और इतर जंतु मनुष्य से पीछे छूटते चले गये. मनुष्य के सोचने समझने की प्रकृति प्रदत्त क्षमता ने सभ्यता और संस्कृति के प्रवाह को ऊर्जा और आवेग प्रदान किया.
पहले परिवार के आस्तित्व में आते ही उन तमाम आवश्यकताओं का उन्मेष होने लगा जो परिवार की गाड़ी को आगे बढ़ाते. नये दम्पति, नया शिशु, नया परिवार और अब नयी आवश्यकतायें! फिर तो आवश्यकताओं ने आविष्कार को जन्म दिया. जितनी आवश्यकतायें, उतने आविष्कार. हथियार, आग, पहिये, पुल, भोजन, वस्त्र, आवास जैसे मील के पत्थरों को वह पार करता रहा. अब खानाबदोशी का जीवन स्थिरता में ठहरा. कृषि कर्म का सूत्रपात हुआ. स्त्री और पुरुष का श्रम विभाजन हुआ. उत्पादन की अवधारणा का जन्म हुआ. परिवार से झुण्ड और झुण्डों से कबीले बने. फिर संपत्ति और स्वामित्व का काल आया. सम्पत्ति और स्वामित्व की कोख से ही वैमनस्य, ईर्ष्या, डाह, टकराव, शीत युद्ध और अनंतर दुष्ट भावों के विकराल वृक्ष का उद्भव हुआ. सभ्यता फैलती गयी और संस्कृति सिकुड़ने लगी. सभ्यताओं की श्रेष्ठता को लेकर संघर्ष होने लगा.तकनीकि, विज्ञान और प्राद्योगिकी नये हथियार बने. अथैव, एक लंबे काल और स्थान की यात्रा करता मनुष्य अपने विकास क्रम के वर्तमान बिन्दु तक पहूँचा है. यह यात्रा अनवरत जारी है. पांडुलिपि के प्रारम्भिक पृष्टों की तरह इसका उपसंहार भी काल के गर्भ में अज्ञात है. 

Saturday, 3 September 2016

गरीबन के चूल्हा चाकी

(बिहार कीे बाढ़ को समर्पित)

गाँजे के दम
हाकिम की मनमानी।
दारू की तलाशी,
खाकी की चानी।
मिथिला मगह कोशी सारण
सरमसार, पानी पानी।
लील गयी दरिया
जान धान गोरु खटिया
तहस नहस ख़तम कहानी।

ये गइया के चरवैया!
ब्रह्मपिशाच!
अबकी गले
का अटकाये हो!
भईया, का खाये हो?
जो गंगा मईया को
सखी सलेहर संग,
गरीबन के चूल्हा चाकी
दिखाने आये हो।

Monday, 29 August 2016

थैया ता ता

सर्कस है सियासत का
कूदते किरदार,
रस्सी राजनीति की!
कोई कुदाता,
सिर्फ कुदाता!
रंगमंच के किनारों से,
बाकी सब कूदते।
कोई कूद के अंदर भी
ले अपनी अलग रस्सी
नाचता और कूद लेता
फिर धीरे से खसक जाता
कूद के बाहर!
अपनी अलग कूद लेकर।
भैया हम तो जनता हैं!
लोकतंत्र के मायालोक में।
जहाँ रंगमंच का 'कूद-शो'
ख़तम होते ही,
अगले पाँच साल तक ।
कूदते रहते हैं
अथक, अनवरत, तबतक
सज नहीं जाता
फिर जबतक।
रंगमंच का ईस्टमैन कलर
बज नहीं जाता।
चुनाव का डंका,
ता ता थैया
थैया ता ता!

Sunday, 14 August 2016

स्वतंत्रता-एक सनातन संस्कार।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कहानी पर गहराई से नज़र डालें तो इस बात का स्पष्ट आभास मिलता है कि यह संघर्ष यात्रा भी पूरी तरह इस देश के सनातन माटी के संस्कार से सिक्त होकर ही निकली है।वैचारिक विभिन्नताओं की अनगिनत धाराओं का अद्भुत समागम है- हमारी आज़ादी की प्राप्ति यात्रा। कोई नरम, कोई गरम। कोई उदार, कोई उग्र। कोई दाम, कोई वाम। कोई नेशनल, कोई सोशलिस्ट। कोई स्वराजी, कोई इम्पेरिअलिस्ट। कोई पूंजीवादी, कोई मार्क्सिस्ट। तो कोई गांधियन मार्क्सिस्ट। कोई धर्म निरपेक्ष, तो कोई कम्युनल। कोई सेक्युलर, तो कोई वर्नाकुलर! मुझे तो लगता है कि इस दुनिया में विचारो की जितनी लताएं पनपी हैं, सबका 'क्रॉस-सेक्शन स्टडी' यदि करना है तो हिंदुस्तान की आज़ादी की गाथा के माइक्रोस्कोप में झांकिए। इन सारी वैचारिक धाराओं के समवेत दर्शन होंगे, पूरे सनातनी तेवर में।
भाई, मेरे शब्द ' सनातनी तेवर' को अपनी ओछी सांप्रदायिक नज़र मत लगाइये। सनातनी तेवर इसलिए कि हिमालय के आंगन इस आर्यावर्त की जीवन यात्रा भी सांस्कारिक स्तर पर सनातन ही है।
न जाने कितने विचार, कितने दर्शन, कितने आध्यात्म, कितने संप्रदाय, जीवन के कितने रंग इस संस्कृति में पनपे, पले, लड़े, बिछुड़े, गले मिले, पर साथ साथ ही चले। विचारों का शास्त्रार्थ हुआ। शस्त्रार्थ नहीं।  ज्ञानमार्गी, भक्तिमार्गी,हठयोगी, सिद्धपंथी, नाथपंथी,कबीरपंथी, दैववादी, कर्मयोगी, द्वैतवादी, अद्वैतवादी, विशिष्टाद्वैतवादी, सगुण, निर्गुण,सूफी, वहाबी - पर मूल में सभी एक ही सत्य के अन्वेषक। सबका उद्देश्य एक। उस परम सत्य को पाना। विचारों की आज़ादी। आत्मा की मुक्ति। वाजश्रवा को नचिकेता की चुनौती। सर्वदर्शानाम एकमेव लक्ष्य- मुक्ति। मुक्तोअहं।
ठीक वैसे ही स्वतंत्रता संग्राम में भी, चाहे 'नरम' या ' 'गरम', 'गाँधी' या 'भगत', उद्देश्य एक ही- 'आज़ाद' होना। हम आजाद ही जनमे हैं, आज़ाद ही मरेंगे।
             इसी का नाम सनातन संस्कार है जो सर्वसमावेशी है। और इसीलिए हम संसार के सबसे प्राचीन ,सर्वकालीन सहिष्णु, सबसे कामयाब और सबसे टिकाऊ लोकतंत्र हैं।' सर्वे भवन्तु सुखिनः' और 'वसुधैव कुटुम्बकम' यही भारतीय राष्ट्रवाद की आत्मा है। इसकी स्वतंत्रता सनातन है। थी, है और रहेगी।
 ऐसे, 'स्वतंत्रता' से ज्यादा सटीक शब्द  ' स्वाधीनता ' प्रतीत होता है. अंग्रेजी के आत्म- निर्भरता का भाव लेकर 'स्वतंत्रता' शब्द अपने राजनीतिक अर्थ और स्वरुप मात्र को परिलक्षित करता है. दूसरी ओर भारतीयता के कलेवर में स्वाधीनता आत्म-सत्ता का पर्याय है. ऐसी आत्मा जो अज है, नित्य है, चिरंतन है, अविकार है,  न जलती है, न भींगती है, न सुखती  है,अबध्य है, न जनमती है, न मरती है, न मारती है और वह अक्षय परमाणु बीज है जो असीम विराट के महा विस्तार का अविच्छिन्न अंश है.
             तंत्र, मन्त्र और यंत्र ! तन को नियंत्रित करने की विधा तंत्र. मन को नियंत्रित करने की विधि मन्त्र. और , यत्न को नियंत्रित करने की युक्ति यंत्र. यानि  तन , मन और यतन (उपाय) को परिचालित , संचालित और काबू में रखने की भारतीय प्रावैधिकी हैं- तंत्र, मन्त्र और यंत्र. जहां इन तीनो की लगाम आ जाए हाथो में - वही सच्ची स्वाधीनता है. वही आत्मा की सत्ता प्रतिष्ठित होती है और ज्ञान का आलोक फूटता है. चेतना के चिन्मय आलोक में प्रकाशमान आत्मा जब चलायमान हो, तब वह मुक्तावस्था के शाश्वत श्रृंगार से सजती है. यही योनी भ्रमण के कीचक पथ में धंसे जीव की मोक्ष उत्कंठा का पान्चजन्य उद्घोष है. इस दृश्य जगत के समस्त चर अचर के परिचालन का नियंत्रण ज्ञान दीप्त आत्मा के हाथों ही होता है जहाँ योग की साधना से मन अनुशासित होता है और तन नियंत्रित! इस अवस्था को पा लेना ही सत्य से साक्षात्कार है और इस साक्षात्कार के उपरांत ही आहार, विचार और आचार में स्वाधीनता का समाहार होता है. अपने इर्द गिर्द के चतुर्दिक वातावरण से उपयुक्त अवयवों का आहरण ही हमारे मन में पुष्ट विचारों का ताना बाना बुनता है . उसकी पोषक छाया में हमारे निर्मल आचरण का विकास होता है  और हम इस जीव जगत के अन्तर्द्वन्द्वो के उदघाटन में तल्लीन होते हैं . स्वाधीन आत्मा मुक्तोंमुखता को सचेष्ट रहती है. जब सारे बाह्य कारकों का आग्रह निष्क्रिय हो जाए,  बल- प्रतिबलों, एवं क्रिया-प्रतिक्रियायों  का आरोप निष्फल हो जाय और अपने से इतर किसी अन्य आकर्षण-विकर्षण  का लेश मात्र भी प्रभाव न हो तो आत्मा स्वयं आत्मा में ही स्थित हो जाती है. इसे गीता में स्थित प्रज्ञता की स्थिति कहा गया है. स्थित प्रज्ञ मनुष्य ही स्वाधीन आत्मा का उपभोक्ता होता है. स्वाधीन आत्मा और परम स्वाधीन उपभोक्ता! परम चैतन्य! स्वाधीनता की सम्पूर्णता! स्वावलंबन का चरमोत्कर्ष! 'स्व' के स्वरुप का शाश्वत सत्य से समीकरण! तुम वहीं 'वह' हो. "तत त्वम् असि"!
  कहीं कुछ ऐसे ही विचारों से प्रभावित होकर  राजनैतिक पराधीन भारत में स्वाधीन विवेकानंद ने वेदान्त दर्शन का अलख तो नहीं जगाया ? या फिर, आज़ादी के आन्दोलन के समर वीर महर्षि अरविंद स्वाधीनता की इसी आध्यात्मिक सुरभि से सराबोर तो नहीं हो गए? या फिर, मोहनदास करमचंद गांधी की रूह में सत्याग्रही महात्मा का यहीं दर्शन तो समा नहीं गया? क्यों न हम भी अपनी स्वाधीन आत्मा को सत्य के इसी आलोक में टटोलें!  

Wednesday, 3 August 2016

दारु, गाँजा, ताड़ी




बुड़बक बाबु
चौपट राजा।
दुरलभ दारू,
पियो गांजा।
या फिर पीयो
नीरा ताड़ी।
जय बिहार
जय बिहारी।

Monday, 1 August 2016

पानी पानी


      (1)
धनकती धरती को देख
फटा कलेजा बादल का
बदमिजाज हवायें मचायें धमाचौकड़ी
करे शोर गाये मल्हार
घटाओं की गीदड़ भभकी
भागा सूरज
बिजली चमकी
दामिनी दम भर
घनश्याम से उलझी
औंधे मुँह जमीन पर गिरी


   (2)
भींगी पत्तियाँ, गीले पेड़
कानन में बदरी करियाई
दरिया उड़ेला
अकुलाये आसमान ने
नदी का पेट फूला
मदन मगन पवन मचाये उधम
खुसुर-फुसुर सोंसियाता सीटी बजाता
लताओं को सहलाता
लतायें इठलायी शरमायी


      (3)
नटखट टहनियाँ उलझी
पत्तियाँ लरजीं
गिलहरियों की बंद हुइ गश्ती
ढ़ाबुस बेंगो पर छायी मस्ती
बरसात के वेग की आहट
रुक रुक आती
चिरई की चहचहाहट
झूम के नाची बरखा रानी

धरती गीली नंगी

शरम से हुई पानी पानी

Tuesday, 26 July 2016

बाबुजी




कल्पना की भीत में
शब्दों से परे
आज भी बाबुजी दिखते
बच्चों को बनाने की ज़िद में
वैसे ही अड़े खड़े।



धागों से बँधे चश्मे
दोनों कानों को
यूँ पकड़े जैसे
तक़दीर को खूँटों में
जकड़ रखा हो वक़्त ने



बुढ़ायी, सिकुची, केंचुआयी
ढ़िबरी सी टिमटिमाती
छोटी आँखें, ऐनक के पार
पाती विशाल विस्तार, यूँ
ज्यों, उनके सपने साकार!



कफ और बलगम नतमस्तक!
अरमान तक घोंटने में माहिर  
जेब की छेद में अँगुली नचाते
पकता मोतियाबिन्द, और पकाते,
सपनो के धुँधले होने तक


पाई-पाई का हिसाब
टीन की पेटी को देते
उखड़े हैन्डिल को फ़ँसा
मोटे ताले को लटका
चाभी जनेऊ को पहनाते


मिरजई का पेबन्द
और ताकती फटी गंजी
अँगौछे के ओहार में
यूँ ढ़क जाती जैसे दीवाली की रात
मन का मौन ,बिरहा की तान में.



कफ, ताला, बलगम, जेब, अँगोछा
पेटी, ,जनेऊ, चाभी, मोतियाबिन्द
मिरजई, बिरहे की तान- सब संजोते
बाबुजी आँखों में, रोशन अरमान
बच्चों के बनने का सपना!

गौरैया






भटक गयी है गौरैया
रास्ता अपने चमन का
सूने तपते लहकते
कंक्रीट के जंगल में
आग से उसनाती
धीरे से झाँकती
किवाड़ के फाफड़ से

वातानुकुलित कक्ष
सहमी सतर्क
न चहचहाती न फुदकती
कोठरी की छत को
निहारती फद्गुदी
अपनी आँखों मे ढ़ोती
घनी अमरायी कानन की......

....टहनियों के झुंड मे
लटके घोंसले
जहां चोंच फैलाये
बाट जोह रहे हैं
चिचियाते चूजे!
भटक गयी है गौरैया


रास्ता अपने चमन का !

मृत्यु!

                      

अपनी जीवन यात्रा का द्रष्टा हमेशा अपने से इतर दर्शक से एक पृथक धरातल पर खड़ा होता है. इस यात्रा के अवसान  बिन्दु पर जीवन के अवयव अनुपस्थित होकर मृत्यु की संज्ञा धारण कर लेते हैं, सही मायने में, मृत्यु का यह संस्कार उसी जीवन यात्री के प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है जिसने उसको भोगा है. बाकी के लिये तो यह मात्र एक घटना है, जिसके बाह्य रुप मात्र का वह अवलोकन करता है. इसीलिये अबतक मृत्यु की अवधारणा उस द्रष्टा की परिकल्पना पर टिकी है जिसने इस प्रक्रिया को स्वयं नहीं भोगा है. अस्तु, यह परिकल्पना मात्र है. सत्य का उल्लेख नहीं. निरा अटकलबाजी! सत्य को भाषित तो वह करेगा जिसने स्वयं मरने की इस प्रक्रिया को जीया है. अब भला ‘मरने’ को जीने वाला इसका उल्लेख करे तो कैसे? न चेतना , न वाणी, न इशारे, न कोई हरकत! सब कुछ पर लग गया विराम. इस विराम बिन्दु का तो कोई पता नहीं, आगे की सुध भला कैसे मिले .
मरने के साथ ही अभिव्यक्ति तो मर गयी , लेकिन विचार? यह यक्ष प्रश्न है. विचारों का मरना और विचारों से मुक्त हो जाना, ये दो अलग अलग बातें हैं. विचार तो जीते जी भी मर सकते हैं, लेकिन मरने के बाद ‘मृतक’ विचारों से मुक्त हुआ है या नहीं. ये भी वो ‘मृतक’ ही जाने!
हाँ, एक बात तो तय है कि नवजात शिशु विचारों से मुक्त होता है, जैविक संस्कारों से नहीं. कष्ट में रोना और खुशी में हँसना, ये जैविक संस्कार हैं. जैसे जैसे शिशु बड़ा होता है, विचारों का उद्भव और विकास होता है. इसका कारक बहिर्भूत जगत है. यानि विचारों के जन्म लेने की क्षमता अन्दर होती है और उनको जन्म देने के आवश्यक कारक बाहर. अब इस आधार पर मृत्यु रुपी विराम स्थल से प्रारम्भ होने वाली यात्रा को ही यदि जन्म मान लिया जाय, तो मृत्यु विचारों से मुक्ति प्रतीत होती है न कि विचार क्षमता और जैविक संस्कारों से. नवजात जैसे जैसे विकसीत होता है,
विचारो की वेलि लता फनफनाने लगती है. एक लता के सुखते ही कई नयी लतायें पनप जाती हैं. सुखने और पनपने की प्रक्रिया जीवन पर्यंत चलती है. विचारों का आना और जाना ही जीवन को सम्वेग देता है. एक विचार मरता है, कई नये जन्म ले लेते हैं. जीवन समाप्त, विचार समाप्त. जीवन से मुक्ति, विचारों से मुक्ति. सम्भवतः, मरने के क्षण भी वह अपने अंतिम विचार से जुझ रहा होगा. वह अंतिम विचार क्या होगा, बड़ा दिल्चस्प और रहस्यमय है.
एक तरल प्रवाह बहकर एक बिन्दु पर थम जाये .  फिर, कुछ समय और स्थान के अंतराल पर एक पूर्णरुपेण नवीन तरल प्रवाह का प्रारम्भ हो जाये. नये तरल का स्वरुप, उसकी ऊर्जा, उसकी मात्रा, उसकी गति; सबकुछ नवीन सबकुछ अलग! जो प्रवाह थमा उसे तो देख लिया पर उसके आगे का अज्ञात है.  या जो अभी जन्मा है उसके वर्तमान प्रवाह की नवीनता तो दिख रही है लेकिन प्रवाह शुरु होने के विराम स्थल के पीछे के पुराने प्रवाह की कहानी अज्ञात है. तो फिर मरने के बाद और जनमने के पहले की पाण्डुलिपि अप्राप्त और अज्ञात है.
ठीक वैसे ही जैसे, दिन भर का थका श्रमिक रात को सुध बुध खोकर सो जाये. नींद की गहरायी में उसे किसी तेज गाड़ी मे सुला दिया जाय . फिर हज़ारो किलोमीटर दूर किसी दूसरी जगह गाढ़ी नींद में ही गाड़ी से उतारकर रख दिया जाय, जगने पर वह पुरानी स्मृति खोकर नये जगह पर नये लोगों के बीच एक नये वातावरण में एक नया दिन बिताये नयी मजूरी में. जहाँ बीते कल से दूर दूर तक उसका कोई सम्बन्ध न हो – विचार से लेकर स्मृति के स्तर तक. यही क्रम अनवरत जारी हो जहां पीछे और आगे के दिन अज्ञात हो, वहीं दिन मात्र याद हो जो जी रहा हो,
ज्ञात, अज्ञात, ज्ञात, अज्ञात और क्रमशः! ज्ञात को हम जीवन और अज्ञात को मृत्यु कह लेते हैं , हम इसे उल्टा भी कह लें तो क्या फर्क पड़ता है. अर्थात ज्ञात को मृत्यु और अज्ञात को जीवन. यानि हम जीवन मरें और मृत्यु जीयें. यह तो हमारी अपनी शब्द संरचना है, चाहे जो नाम दे दें.  किंतु इस नामकरण से परे जो प्रक्रिया है, वह बिल्कुल सत्य है. जन्म के पहले और मृत्यु के बाद – यहीं वह पड़ाव है जो अनंत प्रवाह (?) का  व्यवधान स्थल है जहाँ प्रवाह की निरंतरता टूट जाती है. इस अद्यतन दृश्यमान प्रवाह को भी यदि आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति में अगणित सूक्ष्म से सूक्ष्मतम तंतुओं मे सूक्ष्मदर्शी पैमाने पर विभाजित कर दें तो इस प्रवाह यात्रा में ही ह्में अनंत जीवन और मृत्यु के दर्शन होंगे.
 कोशिकाओं से शरीर का गठन तथा मानसिक तंतुओं का निर्माण होता है. कोशिकायें दीर्घजीवी नहीं होती. एक कोशिका कुछ ही दिनों में नष्ट हो जाती है और नयी कोशिका का निर्माण होता है. यह प्रक्रिया अनवरत जारी रहती है. यानि ‘जंतु-शरीर’ की मूल इकाई ‘कोशिका’ की भी वही दशा और दिशा है जो उस सम्पूर्ण ‘जंतु-शरीर’ की. इस प्रक्रिया की निरंतरता इतनी घनीभूत होती है कि छोटी अवधि में शरीर की असंख्य कोशिकाओं, उत्तकों एवम अंगों के विनष्ट और पुनः नवनिर्मित होने की क्रिया और उसके प्रभाव की सघनता का आभास मात्र भी नहीं होता. किंतु अवलोकन के अंतराल को यदि बढ़ाया जाय तो शरीर की अवस्थाओं का अंतर स्पष्ट हो जाता है. हर क्षण शरीर परिवर्तनशील है. तो, एक बड़े पैमाने पर हम मृत्यु को भी परिवर्तन की कला का एक अमिट बिन्दु क्यों न मानें जिसके पार का सन्धान हम नहीं कर पाते.
विचार-प्रणाली के स्तर पर मृत्यु विचारों के अनवरत प्रवाह का आकस्मिक विराम है. अर्थात, मन के संचय करने की प्रवृति नहीं बल्कि प्रक्रिया का पड़ाव है- मृत्यु.   



                          (2)

अब हम तीन अवस्थाओं पर विचार करें. नीद्रा, समाधि और मृत्यु. नीद्रा अवचेतन से अचेतन तक की स्थिति है. दिल धड़कता है, साँसें चलती हैं, पसीना चलता है, कभी कभी तो पूरा शरीर भी भ्रमण करता है. चेतना का अभाव है नीद्रा. शरीर के बाकी अंग पूरी तरह से सक्रिय रहते हैं. बस नींद आते ही मन सबकुछ छोड़ के विश्राम की मुद्रा में आ जाता है और नींद के जाते ही फिर सबकुछ वापस पकड़ लेता है. नींद में विचार बन्द लेकिन शरीर चालु. चेतना सुषुप्त. शरीर भी सुषुप्त. सुषुप्त, लेकिन जैविक रुप से गतिशील. अर्थात नींद में शरीर का जैविक विकस या क्षरण की प्रक्रिया नहीं रुकती. यानि ऐसा नहीं की बहुत दीर्घ काल तक सोकर कोई व्यक्ति अपने शरीर को दीर्घजीवी बना ले या वृद्धावस्था की ओर भ्रमणशील शरीर की गति पर रोक लगा ले. 
 साधना में शरीर सुषुप्त नहीं, बल्कि मृतप्राय. लेकिन, चेतना जाग्रत, वो भी अपने सर्वोच्च स्तर पर. नींद और साधना में विचार के स्तर पर बस यहीं अंतर है कि नींद में विचार मर जाते हैं जबकि साधना में साधक ध्यान में आते ही विचार मुक्त हो जाता है. नींद से जागने पर नीद्रा-पूर्व विचारों का विकार वापस आ जाने की गुंजाइश रहती है. साधना में ध्यान से पहले के विचारों का विकार पीछे ही छूट जाता है, मन निर्विकार हो जाता है और ध्यान से लौटने के बाद उन विकारों का लेश मात्र भी नहीं लौटता. शरीर भी वहीं रहता है, अर्थात समाधि से पहले शरीर को छोड़कर जहाँ जाता है , ध्यान से लौटते ही वही पकड़ लेता है. यहाँ शरीर सुषुप्त के साथ साथ जैविक आस्तित्व के स्तर पर लुप्त भी हो जाता है. इसीलिये यह मृतप्राय की स्थिति है.  समाधि की अवधि तक शरीर का समय रुक जाता है, उसकी जैविक आयु थम जाती है. समाधि के पहले से समाधि के टूटने तक शरीर कोई जैविक यात्रा तय नहीं करता. समाधि से शरीर की दीर्घजीविता को लम्बा किया जा सकता है.
मृत्यु की स्थिति इन दोनों से इतर चरम स्थिति है जहाँ शरीर अपनी जैविक यात्रा समाप्त कर देता है और उस शरीर का सवार अपनी सवारी के नष्ट होने की चरम अवस्था में अपने को विचारों से मुक्त कर लेता है अन्यथा विचारों के मरने के सिवा अन्य कोई रास्ता नहीं!
                                     ------- क्रमशः

गरमी की छुट्टी

गरमी की छुट्टी
   (1)

थपेड़े लू के
थपथपाती गरमी
थम जाती है हवा
करने को गुफ्त-गु
बुढ़ी माँ से
झुर्रियों के कोटर में
थिरके दो पुलकित नयन
अर्थपूर्ण, गोल चमकदार
लोर से सराबोर!
निहारते शून्य को

    (2)

उठती गिरती लकीरें
मनभावन कल्पना की
सिसियाती हवा
माँ के आँचल में डोल
सोहर-से-स्वर
थरथराते होठ
काँपते कपोल
अर्ध्य-सामग्री सी अस्थियाँ
कलाई की, बन
वज्र सा कठोर....

  (3)

बुहार रही हैं
पथ उम्मीदों का
पसीने से धुली
आँखों में चमकती
धुँधली, गोधुली रोशनी 
उभरती तैरती
आकृतियाँ,
बेटे-बहू-पोते
एक एक को सहेजती
बाँधती वैधव्य के आँचल में

    (4)
कोर के गाँठ खोलती
फटी साड़ी की
निकालती
खोलती पसारती
सिकुड़ी अधगली
स्याह चिट्ठी
डरते-डरते,
न  जाने
कब सरक जाये

मुआ, ये गरमी की छुट्टी! 

Monday, 25 July 2016

नर नपुंसक



दलित छलित मदमर्दित होती
दर-दर मारे फिरती नारी
कैसा कुल कैसी मर्यादा
लोक लाज ललना लाचारी

लंका का कंचन कानन ये
देख दशानन दम भरता है
छली बली नर बाघ भिखारी
अबला का यह अपहरता है

छल कपट खल दुराचार से
सती सुहागन हर जाती हो
देवी देती अगिन परीछा, 
पुरुषोत्तम का घर पाती हो


पतिबरता परित्यक्ता लांछित
कुल कलंकिनी घोषित होती
राम-राज का रजक और राजा
दोनों की लज्जा शोषित होती

राजनीति या राजधरम यह
कायर नर की आराजकता है
सरयू का पानी भी सूखा
अवध न्याय का स्वांग रचता है



हबस सभा ये हस्तिनापुर में
निरवस्त्र फिर हुई नारी है
अन्धा राजा, नर नपुंसक
निरलज ढीठ रीत जारी है !