Sunday, 15 June 2014

बिदा बहुरिया

सुत  गई गोरी, ऑखें खोली,
बिंदिया, चूड़ी, कुमकुम रो ली I



सजा बिछौना, उड़े पताका,
बंध गयी बांस में, जीवन-गाथा I

सजी सेज़ में, लगे लुआठी,
भसम हुआ सब, हो गया माटी I



आसमान से बहे बयरिया,
अगियन की लपटन धधकाये I

पानी भाप बन, उड़ गये उपर,
तन माटी बन, धुल धुसराये I

खतम खेल अब, बुझ गयी बाती,
बिदा बहुरिया, बचे बाराती ! 


आज बाराती, कल बहुरिया,
जीव-जगत के एही चकरियाI