Saturday, 1 March 2014

एक ऋषि से साक्षात्कार

(मैगसेसे पुरस्कार, पद्मश्री और पद्मभुषण अलंकृत, चिपको आंदोलन के प्रणेता, प्रसिद्ध गांधीवादी पर्यावरणविद और अंतर्राष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित श्री चंडी प्रसाद भट्ट कोसमर्पित उनसे पहली मुलाकात का संस्मरण)


एक ऋषि से साक्षात्कार
पोथियों मे ऋषियों की गाथा पढ़ते आया हूँ. उनके आर्ष अभियानों में आकर्षण का भाव होना स्वाभाविक है. मन करता किसी ऐसे पुरोधा से साक्षात्कार होता और यह जन्म कृत्य कृत्य हो जाता. विगत  दिनों एक ऐसे ही मनीषी के दर्शन हुये जिनसे बातचीत के क्रम में ऐसा आभास  हुआ मानों जेठ की तपती दुपहरी में किसी सघन वृक्ष की छाया मे उनकी अमृत वाणी की शीतल बयार का झोंका मेरे मन प्रांतर को गुदगुदा रहा हो. ये युग पुरुष थे – चिपको आंदोलन के प्रणेता, श्री चंडी प्रसाद भट्ट जी. भरतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी क्षेत्र मुख्यालय पटना  केंद्र के चौदहवें स्थापना दिवस(२२ फरवरी २०१४)  पर मेरी मुलाकात रात्री भोज में उनसे हुई. माननीय निदेशक महोदय ने हम दोनो का परिचय करा अपने कक्ष मे हमें बड़ी आत्मीयता से बिठाया.
औपचारिक परिचय के उपरांत थोड़ी ही देर मे बातचीत की मीठास मे ऐसे घुल गये मानो उनसे हमारा दीर्घ परिचय रहा हो. उत्तराखंड के गोपेश्वर के इस संत मे योगेश्वर की छवि भाषित हो रही थी. पर्यावरण प्रकरण पर उनके प्रकांड पांडित्य पर मन लट्टु हो रहा था. प्रकृति के प्रत्येक परमाणु मे पल पल पलनेवाली  परिवर्तन की प्रक्रिया,  पर्यावास पर उसकी प्रतिक्रिया और इसके प्रतिलोम से उनका संगोपांग परिचय उनके विद्वत-व्यक्तित्व की विराटता बखान रही थी.
बातचीत की शुरुआत ग्लेशियर के उर्ध्व-विस्थापन विषय से हुई. ग्लेशियर का उपर की ओर  सिमटना उनसे निःसृत नदियों  के आस्तित्व के विगलन के खतरे की घंटी है. अगर यह चलन जारी रहा तो वह दिन दूर नही जब हमारी विरासत  को ढ़ोने वाली विशालकाय नदियां कृशकाय बरसाती नाले का रुप ग्रहण कर लें.यमुना नदी मे होनेवाले ह्रास पर मेरा मन अनायास चला गया जिसका स्वरूप दिल्ली मे कमोवेश नाले की तरह ही है. और तो और, शहर के गटर के गंदे जल और कारखानों से उत्सर्जित अवशिष्टों को समाहित करने के पश्चात तो कालिंदी अपने भाई यमराज के साथ  ही विचरण करती प्रतीत होती है.
ग्लेशियर के उपर खिसकने से ऐसे प्रदेश मे पनपने और पलने वाले जंतु भी उपर की ओर सिमटते चले जायेंगे. रिक्त स्थान मे वनस्पतियों का उद्भव होगा जिससे हिमखंडों के उर्ध्व-गमन को और गति मिलेगी और  पर्यावासीय पतन को बल मिलेगा. ढ़ेर सारी प्रजातियों के विलुप्त हो जाने का संकट गहरा जायेगा. उन्होने उदाहारण के तौर पर हिम प्रदेश में रहने वाले याक और एक विशेष प्रकार के चूहे का भी उल्लेख किया.
ग्लेशियल-शिफ्ट तो ऐसे एक वैश्विक घटना है किंतु दक्षिण एशिया और मुख्यतः हिंदुस्तान की सभी प्रमुख नदियों का आस्तित्व अपने उद्गम-स्थल हिमालय की हलचलों से ज्यादा प्रभावित होता है. गंगा और ब्रह्मपुत्र भारत को जलपोषित करने वाली सबसे बड़ी नदियां हैं, जिसमे गंगा की भागीदारी २६% और ब्रह्मपुत्र की भागीदारी ३३% है. ग्लेशियर के उपर खिसकने का प्रभाव साफ साफ इन नदियो मे दिखने लगा है और अब ये बरसाती नदी की तरह व्यवहार करने लगी हैं. उत्तराखंड की तुलना मे नेपाल  का हिमालय बिहार से नजदीक है जहां से निकलने वाली तमाम नदियां बरसात मे बाढ़ का कहर ढा रही हैं. कोशी का प्रलय इस प्राकृतिक विपर्ययता का प्रत्यक्ष प्रमाण है. माउंट एवरेस्ट के उत्तर मे कोशी की उद्गम-स्थली है. नेपाल मे वनों की कटाई का दुष्प्रभाव सीधे सीधे वहां के ग्लेशियरों पर पड़ता है. और सच तो यह है कि प्रकृति हमारे दंश से ज्यादा अभिशप्त है जिसे समय समय पर अपने प्रकोपों के रुप में हमें चुकता  कर  रही है. इस बात को भली भांती समझने का माकूल मौका आ गया है. क्षेत्रों को सदाबहार बनाये रखने में ग्लेशियर की अहम भूमिका है. इस हकीकत से अब और मुंह  मोड़ना मारक साबित  हो  सकता है. इसलिये इस तथ्य पर और अध्ययन एवम संधान की आवश्यकता है. यदि सही वक्त पर समुचित कदम उठा लिये जायें तो केदारनाथ जैसी घटनाओं को रोक न सही , कम से कम उनकी मारक क्षमता पर  तो अंकुश लगाया ही जा सकता है. नदियों के सिकुड़ने का धरती की जल धारण क्षमता पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.
बात बढ़ते बढ़ते नदियों के जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना पर आ गयी. इस योजना पर उन्होनें सतर्कता बरतने की सलाह दी.बरसात में तो बात बन जायेगी. परंतु असली समस्या तो गर्मियों की है जब पीने के पानी के भी लाले पड़ जाते हैं. उन्होने कर्नाटक और तमिलनाडु के जल विवाद की ओर ध्यान खींचा. मैंने उनका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित किया कि एक ही मौसम में जब बिहार की नदियां उफनती रहती हैं,  बिहार के ही कुछ भाग और झारखंड की धरती सूखे से दरकती रहती है. तो क्यो नहीं नदियों मे बहने वाली जलराशि का एक समेकित क्षेत्रीय नक्शा तैयार किया जाय और एक क्षेत्र की अतिरिक्त जलराशि को जलहीन क्षेत्रों मे ले जाया जाय? उनका मंतव्य था कि जब नदियों को जोड़ने के लिये भूमि के सतह पर या भूमिगत जलमार्ग बनाये जायेंगे तो उस मार्ग से जल का प्रवाह होगा जो कभी सूखे थे. ऐसी स्थिति में उस क्षेत्र के पर्यावरण एवम पर्यावास पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखना होगा. साथ ही विस्थापन की सामाजिक त्रासदी से निपटने की ठोस रुपरेखा तय करनी होगी. फिर अतिरिक्त जलराशि को परिभाषित करते समय जल बहुल क्षेत्र के पीने के पानी और सिंचाई की स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखना होगा.
स्थानीय जल प्रबंधन की आवश्यकता के संदर्भ में उन्होनें बिहार  का विशेष उल्लेख करते हुए इसके कुप्रबंधन को पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे जल के समुचित प्रबंधन के आलोक  में समझाया. १८५७ में गंगा नहर के निर्माण के उपरांत सिंचाई की समुचित व्यवस्था से वहां की भूमि हरी भरी हो गयी और मेरठ , मुज़फ्फरनगर एवम पड़ोसी क्षेत्रों के किसान करोड़पति! ठीक इसके उलट बिहार मे प्रचुर उर्वरा शक्ति की माटी और जल का अकूत भंडार होने के बावजूद यहां के किसानों के पास सिर्फ बदहाली और गरीब मज़दुरों का पलायन! गंगा नहर में गंगा के पानी को स्थानीय उपयोग मे ले लिये जाने के बाद तो इस नदी की हालत कानपुर से लेकर इलाहाबाद और कमो वेश वाराणसी तक तो पतली ही रहती है. बिहार में आने तक ढेर सारी नदियों  का समागम गंगा के हिस्से आ जाता है और वह गर्भवती ललना के लावण्य से लबरेज़ हो जाती है. यहां आते आते उसे घाघरा से २०%, यमुना से १६% और गंडक से ११% की अतिरिक्त जलराशि प्राप्त  हो  चुकी  रहती है. इसके अलावे पुनपुन , सोन एवम अन्य जलधाराओं  का  भी  सान्निध्य इसे प्राप्त होता है. कुल मिलाकर ५०% अतिरिक्त जलराशि का कोष होता है बिहार में गंगा की गोद में. फिर देश की समूची बेसीन का कोशी का बेसीन १% है जबकि कोशी की जलराशी १३%. अब जल के इस अक्षय कोष के बावजूद जल कुप्रबंधन से शापित इस प्रदेश और इसके कृषकों की कहानी करुणा से सिंचित है. दूसरी तरफ नहरों का जाल बिछा जल के समुचित प्रबंधन से पांच नदियों का प्रदेश, पंजाब, अपनी कृषि उपलब्धियों के कसीदे काढ़  रहा है. इसलिये इस बात पर बल देने की जरुरत है कि पहले स्थानीय कमी की पुर्ति की जाये फिर अतिरिक्त जल को परिभाषित कर विस्थापन और वातावरण , पुनर्वास और पर्यावास इन सभी तथ्यों को ध्यान में  रखकर इस महत्वाकांक्षी योजना पर अमल किया जाय. उन्होने इस संदर्भ मे शासन की लापरवाही पर खेद जताया. कुल १८ नहरों मे बिहार के हिस्से मात्र दो या तीन नहरे हैं. अगर यहां नहरों का जाल बिछा रहता तो पंजाब के खेतों में काम करने  के  बजाय बिहार के लोग अपने  खेतों  मे  काम  क्यो  नहीं करते? हालांकि इस  बात पर उन्होनें गर्व करने  से  गुरेज नहीं किया कि लोग बाहर  देश  विदेश  जायें  और सम्मानजनक पदों पर काम करें.  उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां भागीरथी,गंगा और अलकनंदा जैसी नदियां ३००० मीटर की उंचाई पर बहती हैं जबकि सिंचाई के क्षेत्र ६००० मीटर की उंचाई तक अवस्थित हैं वहां १४% सिंचित क्षेत्र की बात तो पचाई जा सकती है लेकिन बिहार में  तो शत प्रतिशत से नीचे बात नहीं  बनती.
बाढ से जुड़े इंजीनियरिंग पक्षों पर उन्होने बडे मनोयोगपुर्वक मेरी राय जानी.  नदियों की तलहटी मे  गाद के निरंतर जमाव से होने वाले दुष्प्रभाव को मैंने उनके समक्ष रखा. गाद  के  जमा होने से नदियों की गहराई घटती है और त्रिज्या के बढने से जलधारा घटे हुए  यानि कम  क्रांतिक वेग पर ही अपने समरेखीय प्रवाह को छोड़कर आराजक (टर्बुलेंट) हो जाती है और तटीय मर्यादाओं का अतिक्रमण करती बाढ के रुप में अपनी वीभत्सता परोसने लगती है.कभी कभी अपनी अनुशासनहीन अल्हड़ता मे आकुल जल संकुल भुगोल भी बदल  देता  है. बाढ़ में इस गाद का परिमाण और  बढ़ जाता है. इस तरह बाढ़  एक ऐसा प्राकृतिक कैंसर है जो अपने साथ अपने भविष्य को भी लेकर आती है.  जरुरत इस बात की है कि गाद को काछा जाय और नदियों को गहरा बनाया जाय. पनामा और  स्वेज नहरों  में ऐसी व्यवस्था है. काछे गये गाद को किनारों पर पसारा जाय. इस उर्वर गाद  में सघन वन लगाये जायें.
उन्होनें उत्साहित  स्वर में गहरी बना दिये जाने के उपरांत नदियों को जल परिवहनके माध्यम के रुप मे विकसीत किये जाने पर भी जोर दिया. किंतु साथ ही मनीषी के आर्ष वचन में नैराश्य भाव गुंजित हुए – “ इसके लिये प्रबल राजनीतिक इच्छा शक्ति की आवश्यकता है जो यहां दिखता नहीं है.  स्थानीय स्तर पर छोटी बड़ी ऐसी नहरें जिनके तल एवम सतह पक्के नहीं हैं ( अनलाइंड कैनल)  उनसे भी गाद निकालने के काम को प्राथमिकता दी  जानी चाहिये. मनरेगा जैसे कार्यक्रमों में समुचित नियोजन ऐसे ही उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु होने चाहिये . उन्होनें लोगों मे जल संचयन, जल के सदुपयोग एवम जल को संसाधन के रुप मे विकसित करने के लिये प्रशिक्षण की आवश्यकता को प्राथमिकता देने पर बल दिया. दिन ब दिन इस क्षेत्र मे आम जनों की बढ़ती रुचि  और  जागरुकता पर उन्होनें  संतोष तो व्यक्त किया, किंतु शासन के  स्तर  पर दृष्टिगोचर उदासीनता पर अवसाद प्रकट  किया.
प्राकृतिक त्रासदियों की ये विडम्बना है कि वो मानव शरीर और उसके अवयवों की तरह समग्रता में  आचरण  करती हैं. जैसे पेट के  गैस से सिर में दर्द हो सकता है , वैसे ही एक क्षेत्र के लोगों की गलती का खामियाजा दूसरे क्षेत्र में घटित प्राकृतिक त्रासदी के  रुप  में भुगतना पड़ सकता है. इसलिये  पर्यावरणीय असंतुलन की उत्तरोत्तर ह्रासोन्मुख अवस्था को समेकित रुप में समझने और  हल करने की आवश्यकता है.
हम दोनों बातचीत में तल्लीन थे. इसी बीच खाने की बुलाहट आ गयी और हमने अपनी बात को विराम  दिया. इस महान तपस्वी के सान्निध्य में ऐसा  प्रतीत  हो  रहा  था  मानों उनके विचार-प्रसुत ऋचाओं की चिन्मय ज्योति में मन चैतन्य हो उठा हो और उनकी मृदुल वाणी के प्रांजल प्रवाह से अंतस सिक्त हो गया हो. भोजन की मेज पर हमने बिहार की मिथिला संस्कृति की मीठास की चर्चा की. विदा लेने का वक्त आ गया था . बड़े अपनेपन से हमने अपने चलभाष क्रमांक की अदला बदली की और फिर मिलने की आशा जगाकर प्रणाम निवेदित किये.
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