Saturday, 8 February 2014

वसंत



जीवन  घट  में  कुसुमाकर  ने,  
रस  घोला है  फिर चेतन  का /
शरमायी सुरमायी कली में,  
शोभे  आभा  नवयौवन  का //

डाल डाल  पर  नवल  राग में,
प्रत्यूष पवन का मृदु प्रकम्पन/
लतिका ललना की अठखेली में, 
तरु किशोर का नेह निमंत्रण  //

पत्र दलों की नुपुर  ध्वनि सुन,  
वनिता  खोले  घन केश पाश  /
उल्लसित पादप पुंज वसंत में,
नभ में तैरे उर  उच्छवास //

मिलिन्द उन्मत्त मकरन्द मिलन मे,  
मलयज बयार   मदमस्त मदन  में/  
चतुर  चितेरा  चंचल  चितवन  में,  
कसके   हुक    वक्ष-स्पन्दन   में//

प्रणय  पाग  की  घुली  भंग,  
रंजित पराग पुंकेसर   रंग/
मुग्ध मदहोश सौन्दर्य सुधा,  
रासे  प्रकृति  पुरुष  संग //

पपीहे  की प्यासी पुकार में,
चिर संचित  अनुराग अनंत है/
सृष्टि का यह  चेतन क्षण है,
अलि! झूमो आया वसंत है //

n  विश्वमोहन