Saturday, 11 November 2017

अनन्या

मन की वेदना सर्वदा नयनों का नीर बन ही नहीं ढलकती, प्रत्युत अपने चतुर्दिक तरंगायित होने वाली वेदना की उन प्रतिगामी स्वरलहरियों को भी अपने में समेटकर सृजन के  शब्दों में सजती है और  कागज़ पर जिंदगी के बेहतरीन अक्सों  में उभर आती है. भाई संदीप सिंह की  'अनन्या' ने इसका अकूत अहसास दिलाया. छठी मैया की विदाई उषा के अंजोर के उन्मेष से होती है.  पारण के अगले दिन ही मुझे जमशेदपुर जाना था. छोटी पुत्री, वीथिका, ने शाम का रांची का टिकट भी करा दिया था. इसी बीच अप्रत्याशित निमंत्रण मिला कि   आई आई टी रुड़की के हमारे सहपाठी मित्र संदीप सिंह के उपन्यास 'अनन्या' का लोकार्पण शाम के तीन बजे अशोक रोड के वाई डब्लू सी ए सभागार में 'स्टोरी मिरर' प्रकाशन के सौजन्य से होना था. इस मौके पर  ढेर सारे पुराने मित्र भी जमा हो रहे थे. ऐसा अवसर मेरे लिए हमेशा उतेजना पूर्ण होता है. 
हम लोकार्पण स्थल पर पहुंचे . कार्यक्रम प्रारम्भ हो चुका था. अब मै ये बता दूँ कि संदीप सिंह हमारे बैच के आर्किटेक्चर के अत्यंत प्रतिभाशाली छात्र थे. पढाई पूरी करने के पश्चात वह एक उदीयमान वास्तुविद बनने की राह पर निकल पड़े थे.  किन्तु, काल की क्रूरता को कुछ और ही मंजूर था. दुर्भाग्य से मधुमेह की बीमारी ने उनके नेत्रों की रोशनी छीन ली. दोनों आँखों से पूर्ण अशक्त संदीप जीवन का दाव हारते हारते प्रतीत होने लगे थे. तब मै दिल्ली में ही पदस्थापित था. मेरे सिविल इंजीनियरी के सहपाठी  मित्र मनोज जैन ( जो स्वयं कुछ दिनों बाद  अल्प वय में ही सदा के लिए हमारा साथ छोड़ कर चले गए) ने जिस दिन मुझे ये बात बतायी थी और संदीप से टेलीफोन पर मेरी बात भी कराई थी, मेरा मन मलीन और अंतस करुणा से कराह उठा था. मै और मनोज आगे के कई दिनों तक संदीप के पुनर्वास से सम्बंधित योजनाये बनाते रहे थे. समय सरकता जा रहा था. मै पटना आ गया. मनोज परम धाम को चले गए . उनके महा प्रस्थान से चन्द घंटो पहले उनसे फोन से बात हुई थी. आई एल बी एस के बेड से ही लीवर सिरोसिस से लड़ते मनोज ने खुद फोन लगा दिया था . दोनों मित्र अपने सांसारिक अभिनय पात्र को बखूबी खेल रहे थे. मै उन्हें झूठा दिलासा दिला रहा था और वे एक सुस्पष्ट निर्भ्रांत भविष्य का दर्शन दे रहे थे. अगले दिन पता चला था कि 'पंखुड़ी के पापा' अपनी डाली से टूट चुके थे....सदा के लिए!....
उसके बाद संदीप से मेरा संपर्क बिलकुल टूट गया. अबकी बार दिल्ली में छठी मैया मानो जाते जाते संदीप से मेरा संपर्क सूत्र फिर जोड़ गयी थी . विमान पकड़ने की आपा धापी में मै लोकार्पण समारोह में ज्यादा देर नहीं टिक सका. जमशेदपुर से वापस पटना लौटने पर संदीप से मैंने विस्तार में बात की और जीवन समर में नित नित घात प्रतिघातों से दो दो हाथ करने की उनकी अदम्य संकल्प शक्ति का आख्यान सुना. हम यह जानकर मन मसोस कर रह गए कि हमारे पटना प्रवास के अनंतर ही वो भी दो साल अपने भाई के साथ पटना रहे थे किन्तु जानकारी के अभाव में हमारी आँखे कभी चार नहीं हो पायी. अब आगे इसकी पुनरावृति न हो, का भरोसा दिया गया.
लोकार्पण के अवसर पर संदीप के भावुक भाषण की स्वर लहरियां मेरे कर्ण पटल को निरंतर झंकृत कर रही थी. ज़िंदगी की जद्दो जहद से लड़ते इस दृष्टि बन्ध परन्तु जीवन की दिव्य दृष्टि से लबालब दिव्यांग पुरुष ने कैसे आशाओं के तिनके तिनके को जोड़ा और जीवन समर में अजेय योद्धा की तरह अपने को पुनर्वासित किया. उनकी आपबीती आख्यान का हर शब्द प्रेरणा और उर्जा का समंदर हिलोरता था. ज़िन्दगी के ऐसे उदास प्रहर में अवसाद का प्रहार और समाज की निःस्वाद निरंकुश मान्यताओं की निर्मम मार मनोवैज्ञानिक निःशक्तता की ऐसी मंझधार में छोड़ जाते हैं कि पतवार की पकड़ ढीली पड़ जाती है और बवंडर का अन्धेरा छा जाता है. निराशा के ऐसे गहन तमिस्त्र में संदीप ने जिस आत्म बल से आशा के सूर्योदय का सूत्रपात किया वह जीवन के दर्शन का एक अप्रतिम महा काव्य है. नवीन तकनीक के माध्यम से दृष्टिबंधता की अवस्था में कंप्यूटर का कुशल प्रयोग उन्होंने सीखा और निकल पड़े जीवन के एक नए साहित्य की रचना करने. आर्किटेक्चर में शोध प्रबंधों की सर्जना के साथ साथ उनके अन्दर का साहित्यकार जीवित हो उठा और अपने दिल की धुक धुकियों को शब्दों में समेटकर रच डाला 'अनन्या'! उन्ही के शब्दों में :-
" अनन्या कहानी है एक विकलांग युवक विस्तार भारद्वाज की. उसके जीवन के बदलते हुए मौसमों की. अनन्या कहानी है एक मासूम और चुलबुली लड़की अनन्या की जो सूर्य की पहली किरण की तरह दूसरों के जीवन में छाया अन्धेरा दूर कर देती है. अनन्या कहानी है हमारे बदलते नजरिये की, मन में भरी कुंठाओं और कड़वाहट की, रिश्तो के ताने बाने की और प्रेम के उस मीठास की जो हमारे आसपास बिखरी होती है, मगर जिससे हम अक्सर अनजान ही रह जाते हैं. अनन्या कहानी है समाज में विकलांगों के स्थान की , समाज और उनके मध्य अर्थपूर्ण संवाद की आवश्यकता की , क्योंकि जहां यह सत्य है कि विकलांगता के प्रति समाज को अपना दकियानूसी रवैया बदलने की जरुरत है वहीँ यह भी उतना ही सच है कि स्वयं विकलांगो को भी अपने दृष्टिकोण को अधिक व्यापक बनाने और अपनी नकारात्मकता से बाहर निकलने की उतनी ही आवश्यकता है . अनन्या कहानी है टूटे हुए सपनों की चुभन की तो दूसरी तरफ हौसलों की उड़ान की. अनन्या कहानी है उस एहसास की, जो है तो इंसान खुदा है और नहीं है तो धूल का बस एक जर्रा!"  
संदीप, नमन आपके जज्बे को, नमन आपकी अदम्य संकल्प शक्ति को, नमन आपके संघर्ष यज्ञ को, नमन आपकी अन्तस्थली से प्रवाहित जीवन के संजीवन साहित्य को और समर्पित आपको मेरी ये शब्द सरिता -
'अर्जुन' संज्ञाशून्य न होना
कुरुक्षेत्र की धरती पर
किंचित घुटने नहीं टेकना
जीवन की सुखी परती पर
सकने भर जम कर तुम लड़ना
चाहे हो किसी की जीत
अपने दम पर ताल ठोकना

गाना हरदम विजय का गीत !

Saturday, 14 October 2017

एक और एक, एक !

श्वेत शशक सा शरद सुभग सलोना
चमक चांदनी चक मक कोना कोना
राजे रजत रजनी का चंचल चितवन
प्लावित पीयूष प्रेम पिया का तन मन

पवन शरारत सनन सनन सन
पुलकित पूनम तन मन छन छन
कर स्पंदन विश्व विकल मन
चरम चिरंतन चिन्मय चेतन

कुंदेंदु कला की तू कुंतल तरुणाई
लाजवंती ललना लोचन ललचायी
सिहर सिहर सरस समीर सरमायी
अंग अनंग बहुरंग भंग अंगड़ाई

अमरावती की अमर वेळ तू
मदन प्रेमघन मधुर मेल तू
तरुण कुञ्ज तरु लता पाश
वृन्दा वन वनिता विलास,
कान्हा की मुरली के अधर
हे प्रेम पिक के कोकिल स्वर!

किस ग्रन्थ गह्वर के  राग छंद ये गाई,
लय, लास, लोल, लावण्य घोल तू लाई
मन मंदिर में तू, मंद मंद मुस्काई
प्राणों में प्रेयसी, प्रीत प्राण भर लाई

कलकल छलछल छलक मदिरा छाई
शाश्वत सुवास सा श्वास श्वास छितराई
सतरंगी सी, इन्द्रधनुषी! रास रंग अतिरेक
एक और एक प्रेम गणित में होते सदा ही एक!

Monday, 18 September 2017

आज जो जोगन गीत वो गाऊं.

अधरों के सम्पुट क्या खोलूं ,
मूक कंठों से अब क्या बोलूं.
भावों की उच्छल जलधि में,
आंसू से दृग पट तो धो लूँ .

अँखियन सखी छैल छवि बसाऊं,
पुलकित तन भुजबन्ध कसाऊं.
प्रिया प्रीत सुर उर उकसाऊं,
आज जो जोगन गीत वो गाऊं.

विरह चन्द्र जो घुल घुल घुलता,
गगन प्रेम पूनम पय धुलता.
बन घन घूँघट मुख पट छाऊँ,
आज जो जोगन गीत वो गाऊं.

बनू जुगनू जागूं जगमग कर,
रासूं राका संग सुहाग भर.
राग झूमर सोहर झुमकाऊँ,
आज जो जोगन गीत वो गाऊं.

प्रेम सघन वन पायल रुन झुन,
धुन मुरली मोहन की तू सुन।
बाँसुरिया पर तान चढ़ाऊँ,
आज जो जोगन गीत वो गाऊं!

जग जड़  स्थूल  स्थावर  में,
सूक्ष्म चेतन  जंगम को जगाऊँ.
गुंजू अनहद नाद पुरुष बन,
आज जो जोगन गीत वो गाऊं.


Wednesday, 6 September 2017

'पूरा सच'

शफ्फाक श्वेत साया,
एक कलपती काया.
सरकी सपने रात,
झकझोरा, जगाया.

कहा, सोये हो!
भाई, उठो जागो.
बांधो बैनर, मोमबती
जुलुस में भागो.

दाभोलकर, पानसेर, कलबुर्गी,
फट फ़टाफ़ट हैटट्रिक!
फिर कन्नड़काठी कलमकार,
गौरी लंकेश पैट्रिक!

कल मुझे सुलाने पर,
गर तुम न सोते!
फट फटा फट फिर,
विकेट यूँ न खोते!

'पंथी' नहीं था मैं,
लो, मान लिया भाई.
चलो, ये भी माना,
लोकल, छोटा पत्रकार कस्बाई.

पर घर की आबरू,
भाई, सब पर भारी.
या लूटना ललना को,
राम-रहीम की लाचारी!

मेरा क्रांतिकारी कद!
कसम से कसमसाया.
पर पुचकार के पूछा,
तुम कौन! किसने बुलाया?

साया सुगबुगाया, फुसफुसाया,
आवाज फुटती, बुझती......
......मै! 'पूरा सच'
रामचन्द्र छत्रपति!

Sunday, 3 September 2017

सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।

'मनोहर पोथी' के ककहरा से माथा पच्ची करने के उपरांत हमारा मासूम बालपन  'रानी,मदन अमर' के साथ हिंदी की शब्द रचना और वाक्य विन्यास की उलझनों में हुलसता. किसी सुगठित साहित्यिक पद्य रचना से सामना तो स्कूल में होने वाली नित्य प्रातर् कालीन प्रार्थना से ही हुआ. ये बात अलग है कि बाल मन उस प्रार्थना के मर्म को नहीं समझता पर उसके कोरस के सरस  और लय की ललित धारा में नहाकर अघा जरुर जाता. वे दो छात्र और छात्राएं जो इस कोरस गान का नेतृत्व करते मेरे मन में अपनी आराध्य छवि बना लेते. बाद की कक्षाओं में प्रतिभा मूल्याङ्कन के दो ही पैमाने चलन में देखे गए. एक गणित के प्रश्नों को कौन पहले सुलझा लेता, दूसरा क्लास में खड़ा होकर अपने शुद्ध उच्चरित स्वर में बिना किताब देखे कौन कविता पाठ कर अपने अद्भुत आत्म विश्वास का शंखनाद कर दे. बाद में इन कतिपय आत्म विश्वासी वीरों और वीरांगनाओं के ओजस्वी उद्घोष से उत्साहित मास्टर साहब शेष कक्षा को अपनी छड़ी से कविता नहीं रट पाने की पराजय की पीड़ा का कड़वा घूंट पिलाते या कभी कभी बेंच पर खडा करा के 'दर्शनीय' बना देते. बाद में संस्कृत के शब्द रूपों ने दर्शनीयता की इस दशा को और दारुण बना दिया. रहीम की ये पंक्तियाँ तो प्रिय लगती थी कि:
रहिमन मन की वृथा मन ही राखो गोय
सुनी अठिलैहें लोग सब बाँट न लिहें कोय
                   परन्तु उस वेदना को भला मन में कोई कैसे रख पाता जिसे मास्टर साहब की लहराती छड़ी का कोमल हथेलियों से तड़ित ( और त्वरित भी!) स्पर्श आँखों से बरसा कर सार्वजनिक कर देता! मानव जीवन में पुरुषार्थ का सबसे स्वाभिमानी आश्रम होता है बालपन!
हाँ, एक और पैमाना जुड़ गया प्रतिभा के मूल्याकन का. वह था, हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद. हिन्दी की कविताएँ कंठस्थ करने वाले की अपनी अहमियत जरुर थी, लेकिन हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करने में दक्ष कलाकार के आगे वह पानी भरता नज़र आता. बहुत बाद में पता चला कि शिक्षा के इस शैशव सत्रीय प्रशिक्षण के ठीक उलट व्यावहारिक तौर पर असली जीवन में हमारे देश में अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की परम्परा ज्यादा पुष्ट और व्यापक है. अर्थात, ऊपर सब कुछ अंग्रेजी में. संविधान, कोर्ट-कचहरी, विज्ञान, तकनिकी शिक्षा, मेडिकल की पढ़ाई, सब कुछ अंग्रेजी में. उसकी जो  बूंदे हिंदी में रूपांतरित होकर नीचे टपकती हैं उसीको स्वाती सदृश नीचे का हिन्दी भाषी चातक छात्र चखकर अपने ज्ञान का मोती गढ़ लेता है. और तो और, सुनते है, १९४९ में सितम्बर के इसी पखवाड़े में संविधान सभा में हिंदी को राज भाषा बनाने के लिए अंग्रेजी में अद्भुत बहस हुई थी. और अंत में मात्र एक वोट के अंतर पर इस पर मुहर लगी. फिर, अध्यक्ष राजेन बाबु के अध्यक्षीय भाषण ने अपनी फर्राटेदार अंग्रेजी में हिंदी को ' 15 '  वर्षों  के लिए राज सिंहासन पर बिठाया.   
                        मै कक्षा दर कक्षा बढ़ता गया. वचन से लिंग , लिंग से संधि, संधि से समास , समास से कारक , कारक से आशय और आशय से सप्रसंग व्याख्या - इन व्यूहों से निरंतर घिरता चला गया. मैट्रिक तक आते आते तीन पुस्तकों, कहानी संकलन, गद्य संकलन और पद्य संकलन, ने मानों हिन्दी साहित्य के मूल धन की अपार थाती को सँभालने का उत्तरदायित्व मुझ पर ही निर्धारित कर दिया. ऊपर से चक्रवृद्धि ब्याज के रूप में एक निबंध संग्रह- 'जीवन और कला'. पहला निबंध हजारी प्रसाद द्विवेदी का - ' नाख़ून क्यों बढ़ते हैं '. मानों ये नाखून जीवन में हमें घेरने वाले अवसाद का साक्षात् प्रतिनिधित्व कर रहे हों.  साहित्य का इतिहास, कविता के वाद , अलंकार, छंद विधान, शब्द शिल्प - ये सब एक साथ मिलकर मेरे तेजस्वी छात्र जीवन के माधुर्य, ओज और प्रसाद को सोखने लगे. भाषा को पकड़ता, भाव फिसल जाते. भावों को ताड़ता , भाषा उलझ जाती. रटने की क्षमता का हरण करने के बाद ही परम पिता ने मुझे सांसारिक पिता के हाथों सौंपा था ! कोटेशन, कविता याद होते नहीं. वर्तनी का बरतन बिल्कुल साफ़ था. बोर्ड परीक्षा के पहले  'सेंट-अप' टेस्ट होता और उससे पहले ' प्री-टेस्ट '. हिंदी के शिक्षक और प्रकांड विद्वान् डॉक्टर शिव बालक शर्मा प्रसिद्द साहित्य मनीषी फादर कामिल वुल्के के शोध शिष्य रह चुके थे और इस बात को प्रमाणित करने में उनकी प्रतिबद्धता के पारितोषिक रूप में  प्रति दिन न जाने कितने छात्र उनकी पतली छड़ी के मोटे दोदरे अपनी पीठ पर लेकर घर लौटते.
                              'प्री-टेस्ट' का रिजल्ट आया. मै फेल. पूर्णांक १००, उत्तीर्णांक ३३ और प्राप्तांक २७! पहली बार आभास हुआ कि स्थूल शरीर भी हल्का और सूक्ष्म मन भी भारी हो सकता है. जीवन के इस नव दर्शन का विषाद योग लिए घर पहुंचा जहां मेरे न्यायाधीश पिता का 'ऑस्टिन का संप्रभु न्याय-दर्शन' मेरी खातिरदारी की सारी जुगत लेकर पहले से विराजमान था. उन्होंने मन के भारीपन को उतारकर फिर से शरीर के पोर पोर में समा दिया. मुझ पर बरसे दुस्सह दंड की प्रताड़ना के ताप से पिघला तरल मेरी माँ की आँखों में छलका. ये छलके नयन मानों मुझे बौद्धिक कायांतरण की चुनौती दे रहे हों. मै सहमा स्थावर खडा रहा. किन्तु भला समय का पहिया क्यों रुकता! हिंदी के आचार्य डॉक्टर सुचित नारायण प्रसाद का प्रसाद मिला. गुरु के आशीष की छाया में पनपता रहा. बोर्ड परीक्षा में मुझे हिंदी में ७० प्रतिशत अंक आये जो उस जमाने के लिए असाधारण बात होती थी. जिला स्कूल मुंगेर की चाहरदीवारी पार कर पटना साइंस कॉलेज होते हुए इंजीनियरिंग पढने रुड़की पहुच गया. डॉक्टर जगदीश नारायण चौबे, डॉक्टर राम खेलावन राय, प्रोफेसर अरुण कमल(साहित्य अकादमी प्रसिद्धि के प्रख्यात कवि), प्रोफेसर शैलेश्वर सती प्रसाद जैसे स्वनामधन्य शिक्षकों की ज्ञानसुधा का सरस पान सुख मिला. रुड़की आते आते इन गुरुओं ने भाषा और साहित्य का इतना अमृत घोल दिया था कि अब हिंदी की अस्मिता की लड़ाई में शामिल हो गया. हिंदी प्रायोगिक विकास समिति का गठन हुआ. मै कार्यकारिणी का सदस्य बना. हिंदी दिवस समारोह में कैम्पस में अतिथि रूप में पधारे डॉक्टर राम कुमार वर्मा, डॉक्टर विद्यानिवास मिश्र सरीखे हिंदी के बोधि वृक्ष का सानिध्य गौरव मिला. राम कुमार वर्मा जी ने कसम खिलाई- हस्ताक्षर हिंदी में करेंगे. आज तक कसम नहीं टूटी . रूडकी देश का पहला इंजीनियरिंग संस्थान बना जहां अंगरेजी की जगह वैकल्पिक रूप से सेमेस्टर में हिंदी की पढ़ाई की व्यवस्था की गयी. डॉक्टर आशा कपूर हमारी प्रोफेसर रहीं जिनकी अपार ममता और आशीष हम पर बरसे. सबसे पहला पी एच डी शोध पत्र धातु अभियांत्रिकी में हिंदी में इसी संस्थान ने स्वीकृत किया. बाद में अपने अभूतपूर्व संघर्ष की बदौलत श्याम रूद्र पाठक ने आई आई टी दिल्ली में अपना शोध पत्र हिन्दी में स्वीकृत कराने में सफलता पाई. अभी संघर्ष विराम का समय नहीं आया था. पुर्णाहूति तब हुई जब बाद में संघ लोक सेवा आयोग ने अपनी परीक्षाओं में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को माध्यम के रूप में स्वीकार किया.
                                   संघ लोक सेवा आयोग में इंजीनियरी सेवा की मेरी अतर्वीक्षा (इंटरव्यू) थी. डॉक्टर जगदीश नारायण का बोर्ड था. आई आई टी दिल्ली के प्रोफेसर नटराजन साहब सदस्य थे. उन्होंने उन दिनों हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के लिए चल रहे संघर्षों पर चुटकी ली. मै भला क्यों चूकता ! मै उनसे उलझ गया. मैंने स्पष्ट शब्दों में अपने तर्कों को उनके समक्ष रखा. अब वे उस शेर की मुद्रा में आ गए जिसकी ललचायी निगाहें  जलप्रवाह के निचले छोर पर जल पीने वाले मेमने में मुझे निहार रही हो! भला हो चंपारण का, जो मेरी जन्म भूमि है . उन्होंने मुझे घेरने के लिए चंपारण आन्दोलन का इतिहास उकटना शुरू किया.मै कहाँ भला उकताता! लेकिन आपको उकताने से बचाने के लिए मै पूरी कहानी सुनाये बिना ये बता दूँ कि बोर्ड के अध्यक्ष जगदीश नारायण साहब ने मुझे लोक लिया और मै थोडा सशंकित किन्तु विजयी मुद्रा में बाहर आया.
आज हिंदी पखवाड़े में शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर उन समस्त गुरुजनों को याद करते मन में एक अजीब हलचल हो रही है. उनका आशीर्वाद आज भी खूब फल फूल रहा है. अनुभव सर्वदा ज्ञान से श्रेष्ठ रहा है . मेरे जीवन में आये ऊपर वर्णित व अवर्णित सभी पात्र मेरे जीवन पथ को आलोकित करने वाले मेरे पूज्य गुरु रहे हैं और मेरे अनुभव का पोर पोर  उनके आशीष से सिक्त है. वह पल पल मेरी स्मृतियों में सजीव रहेंगे और उपनिषद् की ये पंक्तियाँ उस जीवन्तता में अपना अनुनाद भरती रहेंगी:-
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । 

Saturday, 26 August 2017

ताड़ना के अधिकारी

शिशु की हरकत और  उसके हाव भाव देख माँ ने उसके अन्दर के हलचल को अनायास ताड़ लिया कि भूख लगी है और उसे दूध पिलाने लगी. दूध पिलाने से पहले माँ द्वारा किये जाने वाले उपक्रम और चेष्टाओं की गतिविधियों से शिशु ने भी ताड़ लिया कि उसके स्तन पान की तैयारी चल रही है और शिशु शांत हो गया.एक दूसरे को समझने में जच्चा और बच्चा पारंगत है. उनका पारस्परिक तादात्म्य मनोवैज्ञानिक और आत्मिक स्तर पर है, जिसकी अभिव्यक्ति  'हम'  'आप'  इस पयपान की प्रक्रिया में देख पाते हैं. एक दूसरे को समझने के इस टेलीपैथिक समीकरण को हम ' ताड़ना ' शब्द से अभिहित करते हैं.

                                             ताड़ने की यह प्रक्रिया मनोविज्ञान के सूक्ष्मातिसूक्ष्म धरा पर सम्पन्न होती है. यहाँ कर्ता और कर्म एक दूसरे से ऐसे घुल मिल जाते हैं कि उनमे स्वरूपगत कोई मानसिक भेद नहीं रह पाता. दोनों चेतना के स्तर पर एकाकार हो जाते हैं. कर्ता और कर्म का भेद मिट जाता है. कर्ता कर्म और कर्म कर्ता बन जाता है. दोनों की चेतना का समाहार हो जाता है. दोनों का एक दूसरे के प्रति समर्पण का भाव तरल होकर साम्य की ऐसी स्थिति को प्राप्त कर लेता है कि किसके भाव का प्रवाह किसकी ओर हो रहा है, इस भाव का अभाव हो जाता है और दोनों की चेतनाओं का समागम एक स्वाभाविक निर्भाव की स्थिति को प्राप्त हो जाता है. यहाँ एक का संकेत दूसरे में चेष्टा का स्फुरण और दूसरे का संकेत पहले में चेष्टा का स्फुरण कर देता है. दोनों एक स्वचालित समभाव की स्थिति में आ जाते हैं और भावों की यह एकरूपता इतनी गाढ़ी होती है कि भौतिक संवाद के सम्प्रेषण की कोई गुंजाइश शेष नहीं रह जाती. कर्म के समस्त अवयव कर्ता में और कर्ता के समस्त तंतु कर्म में समा जाते हैं. भावों की प्रगाढ़ता का  यौगिक घोल सहज साम्य की ऐसी विलक्षणता का रसायन पा लेता है कि भाषा गौण नहीं, प्रत्युत मौन हो जाती है.अंगों की झटक, नैनों की मटक, हाव-भाव, स्वर की तीव्रता या मंदता, गात का प्रकंपन , होठों की थिरकन, चेहरे का विन्यास और भावों के सम्प्रेषण के समस्त तार - ये अभिव्यक्ति के तमाम लटके झटके हैं जो मनश्चेतना के महीनतम स्तर पर संचरित होकर अंतर मन से आत्यंतिक संवाद स्थापित कर लेते हैं और एक लय, एक सुर और एक ताल बिठा लेते हैं.

                                                पदार्थ विज्ञान का यह सत्य है कि प्रत्येक पदार्थ की अपनी एक चारित्रिक मूल आवृति होती है, जो उसकी परमाण्विक संरचना का फलन होती है. साथ ही, प्रत्येक पदार्थ अपनी प्रकृति में पदार्थ और उर्जा का द्वैत स्वभाव धारण करता  है. अर्थात, वह स्वरुप  पदार्थ के द्रव्यमान और उर्जा की आवृति रूप में द्वैत आचरण करता है. ऊर्जा उसकी सूक्ष्म आवृति है, तो पदार्थ स्थूल आकृति.  जब दो अलग पदार्थों की अपनी संरचनात्मक स्वाभाविक आवृति समान या समानता के आस पास होती है और दोनों प्रकम्पन की समान कला में होते हैं तो दोनों के मध्य रचनात्मक व्यतिकरण  (constructive interference ) होता है और दोनों के आयाम जुड़ जाते हैं. प्रकम्पन का प्रभाव द्विगुणित हो जाता है. सुर, ताल, लय सभी मिल जाते हैं. इसे अनुनाद की स्थिति कहते हैं. यहाँ दोनों पदार्थ आपस में पूर्ण तादात्म्य या यूँ कह लें,  कि  "कम्पलीट हारमनी" में होते हैं .

                                                  मेरा मानना है कि यहीं ऊर्जा मनोविज्ञान में अपनी सूक्ष्मता और स्वरुपगत वैविध्य के अलोक में चेतन , अवचेतन या निश्चेतन मन का उत्स होती है. ' कम्पलीट  हारमनी '  की स्थिति में चेतना , अवचेतना और निश्चेतना की  तीनों कलाओं में दोनों पदार्थ अभेद की स्थिति में आ जाते हैं. दोनों सर्वांग  भाव  से एक दूसरे के प्रति ' चेत ' गए होते हैं. अर्थात,  यहीं वह बिंदु है जहां एक पदार्थ की चेतना दूसरे की चेतना के प्रति ' चेतना ' आरम्भ कर देती है और फिर दोनों एक दूसरे की  " 'ताड़ना' के अधिकारी" बन जाते हैं.वादक वाद्य की और वाद्य वादक की, सुर गाने की और गाना सुर की, गायक वादक की और वादक गायक की, वैज्ञानिक उपकरण की और उपकरण वैज्ञानिक की, रचनाकार रचना की और रचना रचनाकार  की, कवि श्रोता की और श्रोता कवि की,चरवैया गाय की और गाय चरवैया की, माँ शिशु की और शिशु माँ की, पत्नी पति की और पति पत्नी की, गुरु शिष्य की और शिष्य गुरु की, स्वामी भक्त की और भक्त स्वामी की ...........  आत्मा परमात्मा की और परमात्मा आत्मा की; इस जीव-ब्रह्म  द्वैत के दोनों तत्व एक दूसरे की 'ताड़ना के अधिकारी ' बनकर एक दूसरे को ताड़ने लगते है और उनके आपसी विलयन की प्रक्रिया पूर्ण होने लगती है,  जिसका गंतव्य है 'अनुनाद' की स्थिति को प्राप्त करना, दोनों के स्वरूपगत भेद का मिट जाना. परमात्म विभोर हो जाना !

                                             ठीक वैसे जैसे ढोलकिया ढोलक के रस्से को तबतक तान तानकर अपनी थाप से  तारतम्य मिलाता है जबतक उसे अपने संगीत का अनुनाद न सुनाई दे. ढोलक के ताड़ते ही ढोलकिया भंगिमा की  चेतना में उससे एकाकार हो जाता है.चेतना के सूक्ष्म स्तर पर जुड़ते ही संवेदना के महीन महीन धागे मोटे मोटे दिखने लगते हैं और आस्तित्व का द्वैत संवेदना के अद्वैत में परिणत हो जाता है. समर्पण, सरलता और निःस्वार्थ अभिव्यक्ति का मौन एक दूसरे में ऐसे समा जाता है कि सजीव निर्जीव हो जाता है और निर्जीव सजीव, विद्वान् गंवार बन जाता है और गंवार विद्वान, सेवक स्वामी बन जाता है और स्वामी सेवक, राम हनुमान बन जाते हैं और हनुमान राम, शिव शक्ति बन जाते हैं और शक्ति शिव !  निश्छल, निर्विकार और योगस्थ आत्म समर्पण की पराकाष्ठा ही ताड़ने की इस प्रक्रिया को प्रभावी बनाती है और उच्च परिमार्जित आत्मसंस्कार से ही इन्हे ताड़ा जा सकता है.

                                            हाँ,  जहां कलुषित आत्म संस्कार हों और भावों का मनोविज्ञान विकृत हो तो तत्वों की पारस्परिक कलाएं प्रतिद्वान्दत्मकता  से पीड़ित हो उठती हैं . फिर व्यतिकरण भी विध्वंसात्मक (destructive interference) ! और, जीवन के चित्रपट का स्पेक्ट्रम काले धब्बों से भर जाता है. ताड़ना प्रताड़ना बन जाती है!

                                          आइये, अब हम तुलसी के इन  दोहों के मर्म तलाशने की वर्जिश करें!

" ढ़ोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी,
   सकल ताड़ना के अधिकारी !!!"

Thursday, 24 August 2017

ब्रह्म योग

सपनों की सतरंगी सिंदूरी,
सुघड़ नयन घट घोले .
छन-छन छाया छवि की
क्षण-क्षण, मन-पनघट में डोले.

अभिसार-आँचल-अनुराग,
आरोह-अनंत अवनि का,
अंग-अनंग , अम्बर-सतरंग
अनावृत    यवनिका.

छाये क्षितिज अवनि और अम्बर,
अनहद आनंद आलिंगन.
सनन सनन कण पवन मदन बन,
चटक चाँदनी चन्दन .

दुग्ध-धवल अंतरिक्ष समंदर,
चारु चंद्र चिर चंचल चहके.
चपल चकोरी चातक चितवन,
प्रीत परायण पूनम महके .

नवनिहारिका नशा नयन मद,
प्रेम अगन सघन वन दहके .
सुभग सुहागन अवनि अम्बर,
बिहँस विवश बस विश्व भी बहके.

क्रीड़ा-कंदर्प कण-कण-प्रतिकम्पन,
उदान  अपान  समान .
व्यान परम पुरुष प्रकृति भाषे,
ब्रह्म योग  चिर प्राण .